बोझ न बने बुढ़ापा – ये कहानी एक बार ज़रूर पढ़ें

Bojh Na Bane Budhpa : आज बच्चों की ज़िद पर उन्हें गिरगांव चौपाटी ले गई. वहां श्री पंडित से मुलाक़ात हुई, जो दस वर्ष पूर्व हमारी ही सोसायटी में रहते थे. रोबदार चेहरा, उत्साही मुस्कान. बच्चों के साथ बैठकर रेत के घर बना रहे थे. उनके साथ समुद्र की लहरों में भीग रहे थे. उम्र होगी पचहत्तर के क़रीब. सुखी जीवन के पहलू खुलते-खुलते जीवन के उतार-चढ़ाव भी उनकी आंखों से, बातों से परिलक्षित हो रहे थे. छह साल पहले पत्नी चल बसीं. लड़के-लड़कियां सुस्थिर, विवाहित, उच्च पद पर और फिर आर्थिक सघनता. सब कुछ ऐसा कि नज़र लग जाए. फिर भी अकेलापन आदमी को काटने को दौड़ता है, परन्तु इसका एहसास हो, इसके पहले ही एक सुन्दर से आश्रम (वृद्धाश्रम) में प्रवेश ले लिया और जीवन संध्या जैसे महक उठी.

बच्चों ने बहुत विरोध किया, “पापा, ये क्या पागलपन है? घर में कोई तकलीफ़ है क्या? हमसे कोई ग़लती हुई है क्या? फिर यह अलगाव क्यूं? यह वृद्धाश्रम क्यों?”  पंडित बोले, “बेटे, यह अलगाव इसलिए कि जब तक मैं हूं थोड़ा अंतर रहे, यह ठीक है. तुम मुझे रखते तो यह वृद्धाश्रम होता, मैं यहां आया हूं, तो मेरे लिए ये वानप्रस्थ आश्रम है. मैं अभी बूढ़ा कहां हुआ हूं. अभी मुझे शेक्सपीयर पढ़ना है. प्रेमचंद और महादेवी वर्मा की कहानियों का मर्म जानना है. और भी बहुत कुछ करना है, जो मन में है… मुझे फिर बंधन में मत बांधो.”

और यदि कहें तो वो एक फ़ोन की दूरी पर हैं या फिर उनके लिए मैं इस दुनिया में हूं ही नहीं.
यह सब बताते-बताते वे हमें नारियल पानीवाले के पास ले आए. छोटे बच्चे जैसे उत्साह में बोले, “भैया, मलाई निकाल के दो ना.”

नवजीवन का उत्साह जैसे उनके अंग-अंग में भरा था. इन किया हुआ चेक का रंगीन शर्ट, ब्राउन जीन्स की महंगी ब्रांडेड पैंट, सिर पर कैप. इस उम्र में भी यह सलीका, पर इन सबसे सुन्दर था उनका जीवन के प्रति उत्साह. मैं टकटकी लगाकर जैसे देखती रह गई. यहां तो कहीं भी निराशा का ‘न’ और बुढ़ापे का ‘ब’ नहीं था. था तो स़िर्फ ताज़े फूलों जैसे खिले जीवन की ओर देखने का दृष्टिकोण. मैं बहुत प्रभावित हुई. उनका पता मांगा तो बोले, “यदि दे भी दूं तो आज की पीढ़ी के पास समय कहां है. दो दिन तुम्हारे पर्स में चिट पड़ी रहेगी और तीसरे दिन तुम फेंक दोगी. इसलिए ज़्यादा सोचो मत. यदि क़िस्मत में रहा तो फिर मिलेंगे और यदि नहीं रहा तो पता देकर भी क्या उपयोग?”
और वह आकृति दूर-दूर जाकर धूसर होती चली गई.

श्री पंडित से मिलने के बाद आज बार-बार आंखों के आगे पांडे चाचाजी का उदास खोया-खोया चेहरा नज़र आ रहा था. सच, दोनों में कितना अंतर था. चाचाजी तो बेचारे मशीन बनकर रह गये थे. इस उम्र में भी सुबह उठकर पोते को स्कूल बस के लिए छोड़ना, दूध, तरकारी और अन्य सामान लाना, बिल भरना… न जाने ऐसे कितने ही काम उन पर थोपे गए थे. रिटायर्ड की तख्ती जो लगी थी उन पर. कामों की फेरहिस्त हनुमान की पूंछ की तरह दिनोंदिन बढ़ती जाती थी. परेशान हो गए थे. संघर्षों और पैसों की कमी से उनके कंधे पचासवां वसंत पार करते-करते ही झुक गये थे. एक तरह की गूंगी लाचारी आ गई थी. बस तबसे बुढ़ापे का डरावना सफेद भूत उन्हें ख़ूब डराता था.

आज उनसे मिलने का निश्‍चय किया. दुविधा भी थी, क्योंकि उनसे किसी का मिलना-जुलना बहू-बेटे को पसंद नहीं था. उन्हें श्री पंडित के बारे में बताना था और निमंत्रण भी देना था. निमंत्रण तो बहाना था. हमारी सोसायटी में अधिकांश वृद्ध दंपति ही थे. जब से मैं ब्याहकर आयी थी, उनका अकेलापन, घुटन, मजबूरी और कशमकश देखती आ रही थी. पर कुछ सूझता नहीं था. आज श्री पंडित से मुलाक़ात ने जैसे मेरे बंद दिमाग़ के ताले ही खोल दिए थे. मेरे सास-ससुर आए हुए थे. योजना थी, उनसे मिलवाने के बहाने सारे सीनियर सिटीजन का एक छोटा-सा गेट-टुगेदर रखना, ताकि वो आपस में अपने अनुभव बांट सकें. फिर किसी तरह कोशिश कर उन्हें नियमित अंतराल के बाद मिलवाना. ‘महिला मंडल’ या ‘किटी पार्टी’ की तरह उनका भी एक छोटा-सा क्लब स्थापित करना, फिर दिशा उन्हें ख़ुद-ब-ख़ुद मिल ही जाएगी.

विचारों के ताने-बाने बुनती मैं कब उनके घर पहुंची पता ही नहीं चला. मुझे और मेरे हाथ में उनकी पसंद के बेसन के लड्डू देखकर उनकी आंखें भर आयीं. पत्नी के गुज़रने के बाद उनकी पसंद-नापसंद किसी के लिए कोई मायने नहीं रखती थी. सारी कहानी बताकर बोले, “ज़रा भी खाली होता हूं तो लगता है घड़ी का सेकंड का कांटा भी सौ किलो का वज़न लेकर चल रहा है. कोई मेरी सलाह नहीं मानता. मैं सठिया गया हूं क्या?”

मैंने भी बेटी के हक़ से प्यार से उन्हें समझाते हुए कहा, “चाचाजी, अब आप गृहस्थी की ज़िम्मेदारी से भी रिटायर हो जाइए. इसका बोझ आगे की पीढ़ी के कंधों पर है. इस बोझ से यदि उनके पैरों में मोच आती है, तो अपने अनुभवों का बल दें. परंतु यदि उनके न मांगने पर भी आप अपने अनुभवों और उपदेशों की बेड़ियां उनके पैरों में डालते रहेंगे, तो उनका चलना मुश्किल हो जाएगा और वो ये बेड़ियां उपेक्षा की धार से काट फेकेंगे.”
“बिल्कुल सच कह रही हो बेटी… आंखों के आगे एक परदा था, जो तुमने हटा दिया, सच पंडित ने अच्छा निर्णय लिया.” मैंने फिर धीरे से उन्हें अपनी योजना बताई. उनका आश्‍वस्त उत्साहित स्वर इस बात की गवाही दे रहा था कि उन्हें एक दिशा मिल गई है और जीने का मक़सद भी.

आख़िर वह दिन आ ही गया. सबकी सौ प्रतिशत उपस्थिति ने तो मुझे चौंका ही दिया. पहले मैंने अपनी सास का परिचय कराया कि कैसे वह वर्तमान से शीघ्र ही एकरूप हो जाती हैं. वे बोलीं, “बेटा, औरत की भूमिका तो बचपन से लेकर बुढ़ापे तक बदलती रहती है, इसलिए हर बदलती भूमिका का स्वागत वो उत्साह से करती है.” फिर मैंने उनके व्यस्त कार्यक्रम बताए जैसे, नाती-पोतियों की पढ़ाई में मदद करना, त्योहार पर या कभी खाने में एक आध डिश बना देना, कभी थोड़ी बुनाई, कभी सिलाई और जितना शरीर में सामर्थ्य हो उतनी महिला मंडल के कार्यक्रमों में उपस्थिति.
इस पर मुस्कुराते हुए बोलीं, “अपने अधिकारों का नगाड़ा बजाने के बजाए प्रेम और वात्सल्य की बीन बजाएं, तो सब कुछ सरल हो जाएगा. बढ़ती उम्र के बदलते अधिकारों के सत्य को स्वीकारें. स्त्रियां तो बड़ी आसानी से स्वीकारती हैं, पर पुरुष नहीं. इसलिए तो पानी में पड़े तेल जैसे संसार से अलग-थलग पड़ जाते हैं.” सासुजी की बातें प्रभावशाली थीं.

सभी का उत्साह क़ाबिले-तारीफ़ था. अनुभवों का लेनदेन शुरू हो गया था. उनकी हंसी-ठहाकों और कटाक्षों का मैं शांत बैठकर आनंद ले रही थी. सच, हमउम्र लोगों के बीच कितना रिलैक्स महसूस कर रहे थे सब. एक बात पर सभी एकमत थे कि उन्होंने स़िर्फ पैसा दुगुनी करनेवाली योजनाओं के बारे में ही सोचा, यदि ख़ुशियां दुगुनी करनेवाली योजनाओं की ख़ोज वो पच्चीस-तीस साल की उम्र में कर लेते या कई शौक़ पाल लेते तो यूं समय काटने को न दौड़ता. फिर मुझे कुछ भी करना नहीं पड़ा. कड़ियां जुड़ती गईं. अगली बार मिलने की तारीख़ भी तय हो गयी. प्लान बनते गये और ‘यंग सीनियर सिटीजन क्लब’ की स्थापना भी हो गई. नाम के अनुसार ही उनका जोश और उत्साह देखने लायक था. ख़ुशी के मारे तो मेरे पैर ही ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे.

अचानक मैं अतीत से जागी. आज इस बात को लगभग चार वर्ष हो गए हैं. सभी बहुत व्यस्त हैं. पांडे चाचाजी ने भी अपने लिए जीना सीख लिया है. अब वो सुबह की सैर और योग के पश्‍चात तैयार होकर निकल पड़ते हैं. किसी सामाजिक संस्था में नि:शुल्क एकाउंट्स देखते हैं. शाम को अपने हमउम्र दोस्तों के साथ बैडमिंटन या टेनिस खेलते हैं, या सोसायटी के बच्चों के साथ क्रिकेट में एंपायर का रोल अदा करते हैं. कभी उन्हें कहानियां सुनाते हैं, कभी ख़ुद सुनते हैं. वो ही क्या, लगभग सभी का यही हाल है. सभी व्यस्त हैं. यदि कोई नानाजी/दादाजी या नानीजी/दादीजी अस्पताल में भरती हो गए तो ‘यंग सीनियर सिटीजन क्लब’ के सदस्य उनकी बारी-बारी से देखभाल करते हैं. इससे घरवाले भी चिंतामुक्त रह पाते हैं. सोसायटी की हरियाली और स्वच्छता तो देखते ही बनती है. कई अच्छे-अच्छे सामाजिक उपक्रम चलते हैं. सब एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. सब कुछ मिल-जुलकर होता है.

मेरे लिए होता है, उनकी आंखों में प्यार, धन्यवाद, आशीर्वाद, आदर सब कुछ. मुझे मार्गदर्शक कहते हैं, जबकि सच तो यह है कि ये सब मुझे मेरे भविष्य के रुपहले दिनों के मार्गदर्शक लगते हैं. अभी तो चालीसवां पार किया है. यदि ईश्‍वर ने लंबी उम्र दी भी तो ऐसा ही जोशीला, महकता, रुवाबदार, वृद्धत्व, मेरा भी साथी होगा. मेरा बुढ़ापा बोझ न बने. मैं अपने लिए, अपने जैसा जिऊं. जीवन का रोना-धोना, रामकहानी लोगों को सुनाने की बजाए, मैं पंडित भीमसेन, हरिप्रसाद, लता और पं. रविशंकर के सुरों में खो जाऊं. जीवन की अंतिम सांस तक मेरी लेखनी लोगों का स्पंदन काग़ज़ पर उतारती रहे. और आगे की पीढ़ी दिल से सोचे मम्मी रहें… कभी छोड़कर न जाएं… और रहें… और रहें… बस!

– डॉ. सुषमा श्रीराव

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