गर्भ में ही होने लगता है बच्चे पर इन बातों का असर

गर्भवती महिलाओं को अक्सर नसीहतें मिलती हैं कि ये न खाओ, वो न पियो। ऐसा न करो, वैसा न करो। वरना बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा। इसका कारण यह है कि जैसा खान-पान व व्यवहार मां का होगा वैसा ही असर बच्चे पर भी पड़ेगा। मुख्य तौर पर महिलाओें को उनके खान-पान पर हिदायतें दी जाती है, इसकी वजह भी है। जो भी वो खाती हैं, वो खून के जरिए, बच्चे तक पहुंच जाता है तो जैसे-जैसे वो बढ़ता है, वैसे-वैसे मां के स्वाद की आदत उसे लगती जाती है। Your Baby Can Feel In The Womb

जिस दिन से एक स्त्री को यह पता चलता है कि वह माँ बनने वाली है उस दिन से उसे अपने गर्भ में पल रहे बच्चे से भावनात्मक लगाव हो जाता है। यह बात कि उसके अंदर एक नया जीवन पल रहा है उसे उत्साहित कर देता है। जीवन कब से शुरू होता है इस बात पर अगर हम चर्चा करें तो सभी के अलग अलग मत होते है। कोई कहता है कि माँ के गर्भ में ही जीवन शुरू हो जाता है तो कोई कहता है कि जन्म के बाद जीवन शुरू होता है। बच्चे को क्या फायदा होता है डिलीवरी के बाद देरी से गर्भनाल काटने से

आस पास के लोगों की प्यार की भावनाएं किसी का प्यार पाना सबसे खूबसूरत भावनाओं में से एक होता है। जब आपको कोई प्यार करने वाला होता है तो आप सभी चिंताओं से दूर खुद को सुकून में पाते है। ठीक इसी प्रकार आपका बच्चा भी आपके गर्भ में महसूस करता है। गर्भावस्था के दौरान यदि माँ खुश रहती है तो ऐसे में उसका ब्लड प्रेशर सामान्य रहता है जिसके कारण इस अवस्था में होने वाली कई परेशानियों से उसे छुटकारा मिल जाता है। साथ ही माँ एक स्वस्थ और तंदरुस्त बच्चे को जन्म देती है। तो आइए जानते है खान-पान के साथ और किन-किन बातों का होता है कोख में पल रहे बच्चों पर असर…

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मां ही होती है पहली गुरू :

लाखों साल से कुदरती विकास की प्रक्रिया चली आ रही है जिसे एक मां ही बेहद सुंदर तरीके से निभाती है, मां ही है जो बच्चों की परवरिश करती है, उनकी रखवाली करती है। इसलिए बच्चों को उससे ज्यादा अच्छी बातें कौन सिखा सकता है? एक औरत के लिए गर्भावस्था का समय यह सब बातें सिखाने का सबसे अच्छा समय होता है। तो आइए जानते है कौन-कौन सी बातों का होता है गर्भ में ही बच्चों पर असर।

खान-पान का असर :

आयरलैंड की राजधानी बेलफ़ास्ट की यूनिवर्सिटी ने लगभग 33 गर्भवती महिलाओं पर तजुर्बा किए। इन महिलाओं में से कुछ ऐसी थीं, जो लहसुन खाती थी और कुछ जो लहसुन नहीं खाती थीं। यूनिवर्सिटी का मानना है कि गर्भ के दसवें हफ्ते से ही भ्रूण, मां के खून से मिलने वाले पोषण को निगलने लगता है। यानी की उसी वक्त से मां के स्वाद के बारे में एहसास होने लगता है। हुआ भी यही जब बच्चों ने जन्म लिया तो उन बच्चों में भी उनकी माओं वाले ही लक्षण देखने को मिले। खान-पान के साथ बच्चे पर मां के व्यवहार का भी बहुत असर होता है।

आवाजों का असर :

ऑस्ट्रेलिया में फेयरी नाम की एक चिड़िया पर बेहद ही दिलचस्प रिसर्च हुई है। जिससे सामने आया है कि कोख में पल रहे बच्चों पर आसपास की बातों का भी बहुत असर होता है। शोध के मुताबिक सामने आया कि बच्चे शब्दों पर ज्यादा त्वजों देते है। मां-बाप की आवाज़ को तो बच्चे सबसे ज्यादा पहचानते हैं। इससे उनकी अपनी मात भाषा सीखने की शुरुआत होती है। मां के गर्भ में रहते हुए बच्चों पर गीत संगीत का भी असर पड़ता है। अगर माएं गर्भ के दौरान खास तरह का संगीत सुनती हैं, तो पैदा होने पर बच्चे भी उस आवाज़ को आसानी से पहचान लेते हैं।

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गीत संगीत का असर :

मां के गर्भ में रहते हुए, बच्चों पर गीत संगीत का भी असर पड़ता है। अगर माएं गर्भ के दौरान खास तरह का संगीत सुनती हैं तो पैदा होने पर बच्चे भी उस आवाज को आसानी से पहचान लेते हैं इसलिए मां को चाहिए कि अच्छे से अच्छा, शोर शराबे से दूर वाला संगीत सुने ताकि बच्चा भी अच्छा संगीत सुनने का शौकीन बनें। संगीत के साथ साथ बच्चे स्वाद, खुशबू और कुछ खास आवाजों को पहचानना सीख जाते हैं। 9 महीने से पहले पैदा हुए शिशुओं में होता है बिमारियों का खतरा

खतरों का सामना करना सिखाएं :

हो सके तो अच्छी-2 किताबें पढ़े, जीवन में कठिनाईओं का सामना करने वाली किताबें। जिन्हें पढ़ने से गर्भ में पल रहा बच्चा स्ट्रांग सोच वाला पैदा होगा। हाल ही में सामने आया है कि मेंढक और सैलेमैंडर के बच्चे भी जन्म से पहले ही खतरे की आहट और इससे बचने की जुगत सीख जाते हैं। बेहद खतरनाक माहौल में पैदा होने वाले सैलेमैंडर के बच्चों का बचना बेहद मुश्किल होता है इसलिए उनकी मां द्वारा अंडों में रहने के दौरान ही बाहर के माहौल से रूबरू कराया जाता हैं, जिससे जन्म के बाद वो अपनी रक्षा खुद कर पाएं।

जलन की भावना :

मनुष्य में जलन, ईर्ष्या और द्वेष जैसी भावनाएं आम बात है लेकिन गर्भवती महिलाओं को इस बात का ख़ास ध्यान रखना चाहिए कि गर्भावस्था में इस प्रकार के विचारों का नकारात्मक प्रभाव उनके होने वाले बच्चे पर भी पड़ता है। जलन जैसी भावना से तनाव वाले हार्मोन्स उत्पन्न होते है जिसका असर होने वाले बच्चे पर भी होता है। इतना ही नहीं ऐसे में माँ को सोने और खाने पीने में भी दिक्क्तों का सामना करना पड़ता है जो बच्चे के लिए बिलकुल भी ठीक नहीं होता ।

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बेहद खुशी की भावना :

जब भी हमारे साथ कुछ अच्छा होता है हम बेहद खुश हो जाते है यदि आप गर्भवती है तो याद रखिये अगर आप खुश है तो आपके गर्भ में पल रहा बच्चा भी बहुत प्रसन्न है। इससे आपका ब्लड प्रेशर और हृदत गति भी सामान्य रहती है और शरीर गर्भ में रक्त की आपूर्ति अधिक करता है जिसके कारण आपका बच्चा कई तरह की बीमारियों और इन्फेक्शन से भी दूर रहता है।

जब कोई परेशान करे :

मनुष्य को क्रोध आना एक आम बात है इसमें नया कुछ भी नहीं। कभी किसी को ज़्यादा गुस्सा आता है तो कभी किसी को कम। कई बार ऐसी परिस्तिथि पैदा हो जाती है कि हम सामने वाले की गलती को माफ़ नहीं कर पाते लेकिन यह भी एक सत्य है कि यदि हम किसी के लिए भी अपने मन में बुरी भावनाएं रखेंगे तो इसमें हमारा ही नुकसान है क्योंकि बुरे का फल हमेशा बुरा ही होता है। ठीक इसी प्रकार इसका नकारात्मक प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है। ऐसे में आपका बच्चा भी महसूस करता है कि उसके आस पास कुछ गलत हो रहा है इसलिए गर्भावस्था में बेहतर यही होता है कि आप क्रोध कम करें और अगर ऐसी परिस्तिथि उत्पन्न हो भी जाए तो सामने वाले को माफ़ करके बात वहीँ खत्म कर दें। गर्भावस्था में करेंगी इन चीजों का सेवन तो होने वाले बच्चे का रंग होगा गोरा

अपने आप में बहुत भरोसा :

आत्मविश्वास से सिर्फ आपका मनोबल नहीं बढ़ता है बल्कि गर्भ में पल रहे आपके शिशु पर भी इसका प्रभाव पड़ता है और वह बहुत मज़बूत बन जाता है। हालाँकि, गर्भावस्था में एक स्त्री को कई सारी परेशानियों से गुज़ारना पड़ता है जैसे उल्टी, जी मिचलाना, चक्कर आना आदि ऐसे में अच्छा महसूस करना कठिन होता है । फिर भी जहाँ तक हो सके आप कोशिश करें कि इस अवस्था में आप आत्मविश्वास से भरपूर रहे और खुश रहे। इससे केवल आपका बच्चा ही खुश नहीं रहेगा बल्कि आपकी त्वचा में खिली खिली और दमकती रहेगी।

दुख की भावना :

जब किसी भरोसेमंद या किसी अपने से कोई धोखा मिलता है तो हमारा दिल टूट जाता है । यह सिर्फ शब्दों में ज़ाहिर नहीं किया जा सकता क्योंकि जब दिल टूटा है तो उसका दर्द पूरे शरीर का दर्द बन जाता है। इस दर्द का असर आपके स्वभाव में भी दिखने लगता है । आपके मूड में होने वाले बदलाव का प्रभाव आपके बच्चे पर भी पड़ता है । ऐसे में एक गर्भवती महिला के लिए ज़रूरी होता है कि वह अपने बच्चे के लिए अपनी सोच को सकारात्मक रखे और खुश रहे चाहे परिस्तिथि जो भी हो। याद रखिये ऐसे में आप अपनों के बीच ज़्यादातर समय गुज़ारे जो मुश्किल हालातों में भी हमेशा आपको सहारा दें यानी आपका समर्थन करें।

चिंतित होना :

अक्सर हमने देखा है कि गर्भावस्था में महिलाओं को छोटी छोटी बातों पर चिंता होने लगती है ख़ास तौर पर उन्हें जो पहली बार माँ बनने वाली होती है। माँ बनना एक औरत के लिए बेहद ख़ास अनुभव होता है वह अपने जीवन के एक नए चरण में कदम रखने वाली होती है और उसके जीवन में कई तरह के परिवर्तन आने वाले होते है ।

अगर गर्भावस्था में एक औरत जरूरत से ज्यादा चिंता करने लगती है तो कोर्टिसोल अधिक मात्रा में उत्पन्न होने लगते है जिससे गर्भवती महिला को कई सारी शारीरिक और मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ता है जैसे डिप्रेशन, थकान, सिर दर्द उक्त रक्तचाप आदि। यदि आप को कोई भी चिंता हो रही है तो इस अवस्था में कोशिश करें कि आप चिंतामुक्त रहे क्योंकि यहाँ सवाल आपके बच्चे की सलामती का है। इसके लिए आप योग या लैवेंडर आयल से अरोमाथेरपी का सभी सहारा ले सकती है।

This post was last modified on May 26, 2019 5:32 PM

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