बकरियां चराने वाली सरोज बनी एग्रीकल्चर साइंटिस्ट

Agriculture Scientist Saroj Chowdhary : यह कहानी कुछ अज़ीब है, अनूठी भी है। यह कहानी है भेड़-बकरियों की एक ग्वालिन के कृषि वैज्ञानिक बनने की क़ामयाबी की। जन्म के साथ ही इसकी जिंदगी में बहुत कुछ अनएक्सपेक्टेड घटित होना शुरू हो गया था। जीवटता से ओत-प्रोत महिला-संघर्ष की यह एक गज़ब की दास्तान हैं। अब इसे गौर से सुनिए।

कष्टों की गोद में बीता बचपन :

जयपुर जिला मुख्यालय से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर फुलेरा तहसील के गांव गुमानपुरा मे भेड़-बकरी चराकर और खेती-मज़दूरी करके जीवनयापन करने वाले एक अति सामान्य ग्रामीण परिवेश के रूढ़िवादी सोच से ग्रस्त परिवार में सन् 1984 में एक बच्ची का जन्म हुआ। नाम रखा गया सरोज। पिता जी श्री बन्नाराम जाट (बाजिया) आंशिक साक्षर थे। अनपढ माता जी श्रीमती दाखा देवी की कोख़ से घर मे पुत्र की आश में पाँचवी बेटी के रुप में सरोज का जन्म हुआ। पुत्र-प्राप्ति की आशा लगाए परिवार में लगातार पांचवी बार पुत्री के जन्म पर उस परिवार पर क्या बीती होगी और उस वक़्त वहाँ कैसा माहौल रहा होगा, उसका बस आप अंदाज़ा लगा लीजिए। आज जब सरोज इन सब का अंदाज़ा लगाती है तो सिहर उठती है।

होश संभालते ही माता-पिता द्वारा भेड़-बकरियां चराने की हिदायतें दे दी गईं। विकट पारिवारिक हालात का सामना करने को मज़बूर चारों बड़ी बहनों को कभी स्कूल का मुँह देखने का अवसर सुलभ नहीं हो सका। चारों बड़ी बहने निरक्षरता का दंश झेलने को अभिशप्त थीं। सरोज ने भी बाल्यावस्था में बड़ी बहनों के नक्श-ए-क़दम पर चलते हुए भेड़-बकरी चराना शुरू कर दिया। पर क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बदकिस्मती अब इस घर से बेदख़ल होने वाली थी।

माता जी की कोख़ से छठी व सातवीं संतान के रूप में घर में भाइयों के जन्म की किलकारी गूंजी। अब वक़्त के साथ क़िस्मत ने करवट बदल ली थी। दोनों छोटे भाइयों के पढ़ने की उम्र होते ही उन्हें गांव की सरकारी स्कूल में ले जाने व वहाँ से वापिस घर लाने के लिए मार्गरक्षी के रूप में जिम्मेदारी सरोज को सौंपी गई। गांव में उस वक़्त सिर्फ़ लड़कों को ही घर का चिराग समझकर तालीम दिलाने का रिवाज़ था। भाइयों की हिफाज़त का जिम्मा संभाले यह अबोध-नादान बालिका स्कूल की छुट्टी तक बाहर उनका इंतजार करती रहती थी।

फ़िर एक दिन कुछ अनएक्सपेक्टेड घटित हुआ। स्कूल के सामने बैठकर टुकुर-टुकुर देखते रहने वाली इस छोटी बच्ची को उस स्कूल के शिक्षक ने बच्चों की क्लास में बैठकर पढ़ने के लिए प्रेरित किया। बस फ़िर क्या था। यह बात उस बच्ची के मन माफ़िक थी। वह भी अब भाइयों के साथ स्कूल में पढ़ने लगी। यह उसके जीवन मे क्रांति का आगाज़ था। ये सिलसिला चल पड़ा। दोनों छोटे भाइयों के साथ गांव की सरकारी स्कूल से प्राइमरी तक की पढ़ाई एक प्रतिभशाली बालिका के रूप में पूरी की।

‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’,इस कहावत का अर्थ अब इस बालिका के पिता जी को समझ में आने लगा था। उन्होंने बेटी की प्रतिभा को भांपते हुए और स्कूल के शिक्षको की प्रेरणा से उसे आगे की पढ़ाई के लिए जोबनेर स्थित गोवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल मे दाखिला दिलवा दिया। पढ़ाई का सिलसिला कक्षा-दर-कक्षा जारी रहा। सीनियर सेकेंडरी परीक्षा इस लड़की ने अव्वल दर्ज़े से पास की और उसे राज्य सरकार से छात्रवृत्ति स्वीकृत हो गई ।

कृषि विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए आयोजित प्रवेश-परीक्षा में अच्छी रैंक हासिल होने से सरोज का दाखिला स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर में हो गया। विभिन्न अभावों व संकटों से जूझती और ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी इस लड़की के सपनों को अब पंख लग चुके थे। ‘बड़ा सोचो ; बड़े सपने देखो’, यह धुन दिमाग में सवार हो चली थी। अब इसने कृषि वैज्ञानिक बनने के सपने को साकार करने की ठान ली। यह सपना अब रात-दिन दिमाग़ में चहल-कदमी करने लगा। परिश्रम के पसीने से इस सपने को हक़ीक़त में बदलने की ज़िद परवान पर थी। राज्य सरकार से प्राप्त छात्रवृत्ति का संबल हर साल मिलता रहा। चार साल के कृषि स्नातक (ऑनर्स) कोर्स की परीक्षा में मेरिट लिस्ट में नाम दर्ज़ करवाने में क़ामयाबी मिली। फ़िर कृषि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु आयोजित प्रवेश- परीक्षा में उच्च स्थान अर्जित कर अपनी पंसद के विषय ‘कृषि प्रसार’ में स्नातकोत्तर स्तर के अध्ययन हेतु प्रवेश ले लिया।

यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान दुनियाँ को बेहतर तरीके से समझने का मौका मिला। सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की ललक मन में पैदा हुई। ख्यातनाम फिल्म अभिनेत्री सुष्मिता सेन से प्रेरित होकर एक लड़की को बेटी के रूप में गोद ले कर बालिका सशक्तिकरण कि एक मिसाल समाज के सामने प्रस्तुत की। सरोज की जिंदगी में अनएक्सपेक्टेड घटनाओं के घटने के सिलसिला जारी रहा। इसी दौरान जयपुर जिले के शाहपुरा तहसील के परमानपुरा गाँव के एक सामान्य किसान श्री मालीराम घौसल्या के होनहार बेटे श्री बनवारी लाल जाट के साथ ख़ुद के स्तर पर लिए निर्णय से विवाह हो गया।

शादी के मसले को लेकर परिवार व समाज की ओर से कई बाधाएं खड़ी की गईं। ख़ूब फब्तियाँ कसी जाती रहीं। हतोत्साहित करने की नीयत से कई क़िस्म की बेबुनियाद कहानियाँ गढ़ी गईं। पर इन सबसे घबराकर हिम्मत और हौसला खो देना इस युवती को मंजूर नहीं था। समान विचारधारा के जीवन- साथी मिलने पर दुगुने जोश के साथ मंज़िल की ओर क़दम बढ़ते चले।

आत्मविश्वास से लबरेज़ इस युवती के सधे क़दम शादी के बाद भी शिक्षा के शिखर की डिग्री हासिल करने की दिशा में बढ़ते चले। कृषि संकाय में शोध कार्य करने हेतु पीएच.डी (विध्यावाचस्पत्ति) की प्रवेश- परीक्षा में चयन होने के उपरांत कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर मे रिसर्च स्कॉलर के रूप में पीएच.डी डिग्री हेतु प्रवेश ले लिया। अब तक वह पहले से गोद ली गई एक बेटी के अलावा एक बेटे की मां और बन गयी थीं। घर कि जिम्मेदारी और दोनो बच्चों को संभालने के साथ- साथ शोध कार्य के लिए विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में डटे रहना — ये सब काम एक साथ। मुश्किल भरा दौर था वह।पर हिम्मत के सामने सारी मुश्किलें दूर होती चलीं। बच्चों के लालन -पालन और तमाम पारिवारिक जिम्मेदारीयों को बखूबी निभाते हुए शोध कार्य बख़ूबी सम्पन्न किया और डॉक्टरेट की उपाधि कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर से प्राप्त की।

रिसर्च का काम जारी रखते हुए सरोज ने विभिन्न पदों के लिए भर्ती हेतु आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं मे शामिल होती रही। अपनी प्रतिभा के बल पर करीब आधा दर्जन सरकारी नौकरियों के लिये अंतिम रूप से चयनित भी हुई, लेकिन नज़रे सिर्फ़ कृषि वैज्ञानिक बनने के लक्ष्य पर टिकी रहीं। ज़ुनून परवान पर था और आख़िरकार मार्च 2017 में कृषि विज्ञान केन्द्र, भावनगर (गुजरात) के लिये कृषि वैज्ञानिक के पद के लिये चयन हो गया। जीत की ज़िद और ज़ुनून के संगम से संजोया गया सपना साकार हो गया।

डॉ सरोज सरकारी सेवा के अलावा समय निकालकर सरकारी स्कूलों मे जरुरतमन्द होनहार बच्चों को कॅरिअर काउंसलिंग प्रदान करने साथ- साथ उनकी मोटीवेशनल क्लास भी लेती है। अपने मासिक वेतन की बीस प्रतिशत राशि हर माह वे समाज की जरुरतमंद बालिकाओं को सहयोग स्वरूप प्रदान करती हैं। इसके अतिरिक्त होनहार प्रतिभाओं को प्रशासनिक सेवा की भर्ती हेतु संचालित फ्री कोचिंग में भी योगदान देने में अग्रणी रहती हैं। अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर डॉ सरोज ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी महिलाओं के लिए महिला सशक्तिकरण की एक आदर्श एवं अनुकरणीय मिसाल प्रस्तुत करने में सफ़ल हुई है।

डॉ सरोज का सम्मान

डॉ॰ सरोज चौधरी को “इण्डिया टूडे नेशनल वूमन सम्मिट अवार्ड 2018” के लिए चुना गया है। उन्हें यह अवार्ड उनके द्वारा सूदूर ग्रामीण परिवेश की विषम परिस्थितियों से मुकाबला करते हुए उच्च शिक्षा अर्जित कर कृषि वैज्ञानिक के पद पर चयनित होने, बालिका सशक्तिकरण में सार्थक सहयोग देने और गुजरात के जिला भावनगर स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र में पदस्थापन के दौरान जिले में किसानों, खासकर महिला किसानों, के साथ काम करते हुये उनके आर्थिक विकास और सामाजिक सोच मे बदलाव का मार्ग प्रशस्त करने के लिये प्रदान करने का निर्णय लिया गया। यह अवॉर्ड उन्हें 30 मार्च 2018 को भोपाल( मध्यप्रदेश ) में इण्डिया टूडे ग्रुप और मध्यप्रदेश सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘वूमन अचीवर अवार्ड्स समारोह 2018’ में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान एवं राज्यपाल श्रीमती आनन्दीबेन पटेल द्वारा प्रदान किया गया है। इस प्रतिभाशाली युवती के उज्ज्वल भविष्य की अनन्त शुभकामनाएं!!

मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया

डॉ॰ सरोज चौधरी को मिला वूमन सम्मिट अवार्ड अॉफ ईयर-2018: 26 सितम्बर 2018, परमानपुरा गाँव निवासी डॉ. सरोज चौधरी को राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे ने इण्डिया टुडे वुमन सम्मिट अवार्ड फॉर स्पिरिट से सम्मानित किया। डॉ॰ सरोज कृषि विज्ञान केन्द्र भावनगर गुजरात में विषय वस्तु विशेषज्ञ पद पर कार्यरत हैं। वर्ष 2018 के लिये अदम्य साहस के साथ विपरीत परिस्थितियों में अपने मुकाम हासिल करने वाली देश की महिलाओं को वूमन सम्मिट अवार्ड प्रदान किये। डॉ॰ सरोज चौधरी को यह अवार्ड सद्भावना श्रेणी में दिया गया।

डॉ॰ सरोज को यह अवार्ड अदम्य साहस के साथ विपरीत परिस्थितियों से मुकाबला करते हुये अपना मुकाम हासिल करने और बालिका सशक्तिकरण और महिला किसानों के आर्थिक और सामाजिक सुदृढ़ीकरण के लिये दिया गया। पुरुस्कार प्रदान करते हुये मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे ने डॉ. सरोज चौधरी के विपरीत परिस्थितियों में कृषि वैज्ञानिक तक का सफर तय कर सफलता के ऊंचे मुकाम हासिल करने पर डा. सरोज को बालिका सशक्तिकरण की मिशाल बताया। जयपुर में बुधवार देर शाम को आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, तकनीकी शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी, इंडिया टुडे के मुख्य संपादक राज चैंगप्पा की मौजूदगी में आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया गया ।

डा. सरोज चौधरी वर्तमान में कृषि विज्ञान केंद्र भावनगर में कृषि वैज्ञानिक के पद पर पदस्थापित है। इस दौरान विचार व्यक्त करते हुए डॉ. सरोज चौधरी ने कहा कि माता पिता साधारण किसानी व मजदूरी का काम करते थे। बचपन में खेती किसानी करने के दौरान स्कूल जाते साथियों को देख शिक्षा के लिए लगन लगी तथा मेहनत करने में जुट गई। डा. सरोज चौधरी ने कहा कि कोई भी इंसान यदि मन में दृढ़ संकल्प कर ले और लक्ष्य निश्चित कर उस में जुड़ जाए तो कोई भी मंजिल असंभव नहीं है।

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