Surdas Jayanti
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हेल्लो दोस्तों भक्तिकाल के सगुण धारा के कवि सूरदास जी की जयंती पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। महाकवी सूरदास भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे। वो जन्म से ही अंधे थे किन्तु भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का जैसा वर्णन सूरदास ने किया है वो कोई नेत्र वाला भी नहीं कर सकता। उनके काव्य में कृष्ण के प्रति प्रेम और भाव इस तरह झलकते है जैसे उन्होंने स्वयं श्री कृष्ण की लीलाओं को देखा और महसूस किया हो।

सूरदास को कृष्ण का परम भक्त माना जाता है। कृष्ण की हर लीला का वर्णंन उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से इस प्रकार किया है कि हर ओर कृष्ण ही कृष्ण दिखाई पड़ते हैं। सूरदास जी भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का अपने पद, दोहे और काव्यों द्वारा जन-जन में वात्सल्य का भाव जगाया। और उन्होंने ही माखनचोर, नंदलाल और यशोमति मैया के लाडले को बाल गोपाल बनाया।

गुरु वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग पर सूरदास ऐसे चले कि वे इस मार्ग के जहाज तक कहलाए। अपने गुरु की कृपा से भगवान श्री कृष्ण की जो लीला सूरदास ने देखी उसे उनके शब्दों में चित्रित होते हुए हम आज देखते हैं। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के उपासक और ब्रजभाषा के महत्वपूर्ण कवि महात्मा महाकवी सूरदास के जन्म के विषय में तो काफी मतभेद है किन्तु फिर कई विद्वान उनका जन्म 1478 ईस्वी में रुनकता नामक गांव में हुआ। यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है।। वैशाख शुक्ल पंचमी को सूरदास जी की जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष सूरदास जयंती मई 06 (शुक्रवार) को मनाई जाएगी।

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सूरदास जयंती कब है? (Surdas Jayanti Kab Hai)

सूरदास के जन्म की सही तारीख अभी भी स्पष्ट नहीं है क्योंकि 1479 ईस्वी और 1478 ईस्वी के बीच भ्रम की स्थिति है। सूरदास की जन्मतिथि को लेकर पहले मतभेद था, लेकिन पुष्टिमार्ग के अनुयायियों में प्रचलित धारणा के अनुसार सूरदास जी को उनके गुरु वल्लाभाचार्य जी से दस दिन छोटा बताया जाता है। वल्लाभाचार्य जी की जयंती वैशाख कृष्ण एकादशी को मनाई जाती है। इसके गणना के अनुसार सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि (5 वें दिन) को माना जाता है। इस कारण प्रत्येक वर्ष सूरदास जी की जयंती इसी दिन मनाई जाती है इस वर्ष यह सूरदास जयंती की 544 वीं जयंती होगी।।

ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह दिन मई या अप्रैल के महीने में आता है। भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त महाकवि सूरदास जयंती (Surdas Jayanti) का यह पर्व भारत के उत्तरी भाग में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाई जाती है। इस दिन वृंदावन ने कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता हैं। इस वर्ष सूरदास जयंती 6 मई को मनाई जाएगी

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क्यों मनाई जाती है (Surdas Jayanti Kyo Manate Hain)

सूरदासजी ने अपने कार्य और उत्कृष्ट साहित्यिक कौशल के लिए सारी दुनिया में मान्यता प्राप्त की। उनके गीतों और कविताओं ने पूरे देश में बहुत प्रशंसा और स्वीकृति प्राप्त की। सूरदास भगवान कृष्ण के सबसे महान अनुयायियों में से एक थे और देवता के जीवन के विभिन्न चरणों के लिए लेखन और गायन के लिए पूरी तरह से समर्पित और इच्छुक थे। भगवान कृष्ण के सम्मान में उनकी दिव्य गायन और कविता के कारण, उन्हें उनके शिष्य के रूप में माना जाता था इसलिए सारे भारत में खासकर उत्तर भारत में सूरदास जयंती को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। मुख्य रूप से संगीत और कविता के क्षेत्र से जुड़े लोग सूरदास जयंती के दिन सूरदास को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, क्योंकि उनका कविता और हिंदू धार्मिक संगीत के प्रति जबरदस्त और अविश्वसनीय योगदान था।

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कैसे मनाई जाती है? (Surdas Jayanti Kaise Manate Hain)

  • सूरदास जयंती मुख्य रूप से देश के उत्तर भारत (उत्तरी क्षेत्रों) में मनाई जाती है।
  • इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है और सूरदास के साथ इस दिन भगवान कृष्ण के लिए भी व्रत रखा जाता है.
  • ब्राह्मणों को भोजन कराने की भी परंपरा है।
  • लोग उनके द्वारा लिखित पांडुलिपियों का जाप करते हैं और महान संत को याद करने के लिए इस दिन भजन और कीर्तन भी आयोजित किए जाते हैं।
  • वृंदावन और ब्रज में सूरदास जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है और विभिन्न संगीत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है
  • वृंदावन में सूरदास जयंती के दिन कुछ विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
  • सूरदास जयंती के इस पावन अवसर पर ब्रज जोश और उत्साह से भर जाता है और हर साल जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

सूरदास का जीवन परिचय (Surdas Jeevan Parichay)

कवि सूरदास का जन्म दिल्ली के पास पंडित रामदास सारस्वत के यहाँ आगरा में रुनकता जिले के बहुत निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जबकि कुछ लोगों का दावा है कि उनका जन्म हरियाणा के सीही नामक गांव में हुआ था। उनके तीन बड़े भाई थे। सूरदास के बचपन का नाम मदन मोहन था और वे जन्म से ही अंधे थे, किंतु भगवान ने उन्हें सगुन बताने की एक अद्भुत शक्ति से परिपूर्ण करके धरती पर भेजा था। मात्र छ: वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने अपने माता-पिता को अपनी सगुन बताने की विद्या से चकित कर दिया था। लेकिन उसके कुछ ही समय बाद वे घर छोड़कर अपने घर से चार कोस दूर एक गांव में जाकर तालाब के किनारे रहने लगे थे। सगुन बताने की विद्या के कारण शीघ्र ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। इस उपलब्धि के साथ ही वे गायन विद्या में भी शुरू से ही प्रवीण थे। फिर अठराह साल की उम्र में उन्हें संसार से विरक्ति हो गई और सूरदास वह स्थान छोड़कर यमुना के किनारे (आगरा और मथुरा के बीच) गऊघाट पर आकर रहने लगे।

एक बार गऊघाट पर उनकी भेंट गुरु श्रीवल्लभाचार्य से हुई और फिर जल्द ही उनके शिष्य बन गए। सूरदास गऊघाट पर अपने कई सेवकों के साथ रहते थे और वे सभी उन्हें ‘स्वामी’ कहकर संबोधित करते थे। वल्लभाचार्य ने उनकी सगुण भक्ति से प्रभावित होकर उनसे भेंट की और उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया। वल्लभाचार्य ने उन्हें गोकुल में श्रीनाथ जी के मंदिर पर कीर्तनकार के रूप में नियुक्त किया और वे आजन्म वहीं रहे। वहां वे कृष्ण भक्ति में मग्न रहें। उस दौरान उन्होंने वल्लभाचार्य द्वारा ‘श्रीमद् भागवत’ में वर्णित कृष्ण की लीला का ज्ञान प्राप्त किया तथा अपने कई पदों में उसका वर्णन भी किया। उन्होंने ‘भागवत’ के द्वादश स्कन्धों पर पद-रचना की, ‘सहस्त्रावधि’ पद रचे, जो ‘सागर’ कहलाएं। सूरदास की पद-रचना और गान-विद्या की ख्याति सुनकर अकबर भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकें। अत: उन्होंने मथुरा आकर सूरदास से भेंट की। श्रीनाथजी के मंदिर में बहुत दिनों तक कीर्तन करने के बाद जब सूरदास को अहसास हुआ कि भगवान अब उन्हें अपने साथ ले जाने की इच्छा रख रहे हैं, तो वे श्रीनाथजी में स्थित पारसौली के चन्द्र सरोवर पर आकर लेट गए और श्रीनाथ जी की ध्वजा का ध्यान करने लगे। इसके बाद सूरदास ने अपना शरीर त्याग दिया।

सूरदास जी की मृत्यु (Surdasji Ki Mrityu)

सूरदास जी ने अपने पूरे जीवन में केवल श्री कृष्ण जी की ही भक्ति की है और इन्होंने जो भी रचनाएं लिखी हैं, उनमें केवल श्री कृष्ण का ही जिक्र है। सूरदास ने अपने जीवन की अंतिम सांस 1561-1584 के बीच ली थी और इनका निधन ब्रज में ही हुआ था। सूरदास की महानता को सम्मान देते हुए भारतीय डाक विभाग ने उनके नाम से एक डाक टिकट भी जारी किया था।

सूरदास जयंती का महत्व (Soordas Jayanti Mahatva)

सूरदास भगवान कृष्ण के एक उत्साही अनुयायी थे और उनका जीवन उनके देवताओं के लिए लेखन और गायन के लिए समर्पित है। उनके गीत ज्यादातर कृष्ण के जीवन के विभिन्न चरणों के बारे में थे और इसी दिन, लोग महान कवि को हिंदू धार्मिक संगीत और कविता में उनके अविश्वसनीय योगदान के लिए श्रद्धांजलि देते हैं।

सूरदास जयंती भगवान कृष्ण भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण त्योहार है। वह एक समर्पित संत थे, जिनका काम भगवान कृष्ण के जीवन के इर्द-गिर्द घूमता था। उनके गीतों और कविताओं को उनके अनुयायियों ने आज तक सुनाया है।

सूरदास की रचनाएं (Surdas ki Rachnaayen)

महान कवि सूरदास जी ने कई सारी रचनाएं लिखी हैं जो कि सब श्री कृष्ण जी से जुड़ी हुई हैं। इन सभी रचनाओं में सूरदास ने श्री कृष्ण के प्रति अपने प्रेम और भक्ति को जाहिर किया है। सूरदास द्वारा लिखी गई रचनाओं में से पांच रचनाएं काफी प्रसिद्ध हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं-

  • सूरसागर
  • सूरसारावली
  • साहित्य-लहरी
  • नल-दमयन्ती और
  • ब्याहलो

उनके द्वारा लिखे प्रसिद्ध भजन (Surdas Bhajan)

  • रे मन कृष्णा नाम कही लीजै
  • मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे
  • दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे
  • मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
  • सबसे ऊंची प्रेम सगाई
  • अखियाँ हरी दर्शन की प्यासी
  • प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो

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