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हेल्लो दोस्तों हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान में आदि गुरु शंकराचार्य (Shankaracharya Jayanti 2022) का योगदान बहुत बड़ा माना जाता है. उनका जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को 788 ई. में दक्षिण राज्य केरल के कालड़ी नामक ग्राम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था, इस दिन देशभर में शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है.

शास्त्रों के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य भगवान शिव (Lord Shiva) के अवतार थे और धरती पर उनका अवतरण सनातन धर्म के उत्थान के लिए ही हुआ था. आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की प्रतिष्ठा के लिए भारत के 4 क्षेत्रों में चार मठों की स्थापना की. इस बार शंकरचार्य जयंती 6 मई, शुक्रवार को है।

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आदि गुरु शंकराचार्य का जीवन परिचय

जन्म788 ई.
जन्मस्थानकेरल के कलादी ग्राम मे
पिताश्री शिवागुरू
माताश्रीमति अर्याम्बा
जातिनाबूदरी ब्राह्मण
धर्महिन्दू
राष्ट्रीयताभारतीय
भाषासंस्कृत, हिन्दी
गुरुगोविंदाभागवात्पद
प्रमुख उपन्यासअद्वैत वेदांत

चार मठों की स्थापना

आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की प्रतिष्ठा के लिए भारत के 4 क्षेत्रों में चार मठ स्थापित किए तथा शंकराचार्य पद की स्थापना करके उन पर अपने चार प्रमुख शिष्यों को आसीन किया। तबसे इन चारों मठों में शंकराचार्य पद की परम्परा चली आ रही है। ये चार मठ इस प्रकार हैं-

  • पहला मठ दक्षिण भारत में वेदांत मठ की स्थापना श्रंगेरी (रामेश्वरम) में की. जिसे प्रथम मठ यानी ज्ञान मठ का नाम दिया.
  • इसके बाद पूर्व भारत यानी जगन्नाथ पुरी में दूसरे मठ गोवर्धन मठ की स्थापना की.
  • इसके बाद पश्चिम भारत द्वारिकापुरी में तीसरे मठ यानी शारदा मठ की स्थापना की, यह मठ कलिका मठ के नाम से भी जाना जाता है.
  • चौथे एवं अंतिम मठ के लिए उन्होंने उत्तर भारत के बद्रिका आश्रम को चुना जो कि जोशीमठ में स्थित है।.

इन चारों मठ की स्थापना करने के उपरांत देश के कोने-कोने में घूम-घूम कर हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार किया. 32 वर्ष की अल्पायु में सम्वत 820 में केदारनाथ के समीप आदि शंकराचार्य ने देह त्याग कर गोलोकवास हो गये.

शंकराचार्य जयंती कैसे मनाई जाती है?

  • सभी शंकराचार्य मठ के बीच, इस विशेष दिन को बहुत उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है।
  • मठों में हवन, पूजन और सत्संग का आयोजन किया जाता है जैसे कि केरल में स्थापित श्रृंगेरी शारदा पीठम, कांचीपुरम में स्थापित कांची कामकोटि पीठ आदि।
  • सनातन धर्म पर चर्चा और भाषण भी इसी दिन आयोजित किए जाते हैं।
Adi Shankaracharya Jayanti

आदि शंकराचार्य के जन्म से जुड़ी कथा

(Shankaracharya Katha) एक ब्राह्राण दंपति का विवाह होने के कई साल के बाद भी कोई संतान नहीं हुआ. उन्होंने परेशान होकर संतान प्राप्ति के लिए भगवान शंकर की आराधना की. तपस्या से खुश होकर भगवान शंकर ने उस ब्राह्मण दंपत्ति को वरदान मांगने को कहा. ब्राह्राण दंपति ने भगवान शंकर से कहा कि उन्हें संतान चाहिए. एक ऐसा संतान जिसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैसले. इस पर भगवान शंकर ने कहा कि तुम्हारी संतान में कोई एक ही चीज हो सकती है, या तो वह दीर्घायु होगा या उसकी प्रसिद्धि होगी.

इसपर ब्राह्मण दंपत्ति ने दीर्घायु की बजाय सर्वज्ञ संतान की कामना की. इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति के घर एक बच्चे का जन्म हुआ. उन्होंने इस बालक का नाम शंकराचार्य रखा. शंकराचार्य जब मात्र तीन साल के थे तब पिता का देहांत हो गया. तीन साल की उम्र में ही उन्हें मलयालम का ज्ञान प्राप्त कर लिया था.

शंकराचार्य बचपन से ही सन्यासी बनना चाहते थे लेकिन मां एकमात्र बेटे को यह इजाजत कैसे दे सकती थी. हालांकि शंकराचार्य के संन्यासी बनने के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. एक बार वह नदी के किनारे थे कि तभी एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया. शंकराचार्य ने तुरंत अपनी मां से कहा कि उन्हें संन्यासी होने की अज्ञा दे वरना मगरमच्छ उनका पैर खा जाएगा. इसपर शंकराचार्य को मां ने आज्ञा दे दी.

आदि गुरु शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के दर्शन का विस्तार किया. उन्होंने सनातन धर्म का संरक्षण करने के लिए भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की. जो आज भी हिंदू धर्म के सबसे पवित्र मठ माने जाते हैं. उन्होंने उत्तर में बदरिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ, पश्चिम में द्वारिकाशारदा पीठ, दक्षिण में शृंगेरी पीठ और पूर्व में जगन्नाथपुरीगोवर्द्धन पीठ की स्थापना की.

दरअसल उस दौर में विभिन्न मतों से मिल रही चुनौती को उन्होंने अद्वैत से परास्त किया. आदि शंकराचार्य को अद्वैत का प्रवर्तक माना जाता है. उनका कहना था कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं. हमें अज्ञानता के कारण ही दोनों भिन्न प्रतीत होते हैं.

शंकराचार्य की प्रमुख ग्रंथ एवं रचनाएं

आदि गुरु शंकाराचार्य जी ने अपने अथाह ज्ञान से हिन्दी, संस्कृत समेत अन्य भाषाओं में अलग-अलग  उपनिषद, गीता पर संस्करण आदि लिखें। उन्होंने अद्धैत वेदांत नाम का प्रमुख उपन्यास लिखा एवं शताधिक ग्रंथों की रचना की। इसके अलावा उन्होंने श्री मदभगवत गीता, ब्रह्मसूत्र एवं उपनिषदों पर कई दुर्लभ भाष्य लिखे। वे इतिहास के सबसे प्रकंड विद्धान एवं दार्शनिक थे जिनके सिद्धान्तों को अपनाने से कोई भी व्यक्ति अपना जीवन बदल सकता है।

अष्टोत्तरसहस्रनामावलिः
उपदेशसहस्री
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम्‌
तत्त्वविवेकाख्यम्
दत्तात्रेयस्तोत्रम्‌
द्वादशपंजरिकास्तोत्रम्‌
पंचदशी
कूटस्थदीप
चित्रदीप
तत्त्वविवेक
तृप्तिदीप
द्वैतविवेक
ध्यानदीप
नाटक दीप
पंचकोशविवेक
पंचमहाभूतविवेक
पंचकोशविवेक
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्द
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्द
ब्रह्मानन्दे योगानन्द
महावाक्यविवेक
विद्यानन्द
विषयानन्द
परापूजास्तोत्रम्‌
प्रपंचसार
भवान्यष्टकम्‌
लघुवाक्यवृत्ती
विवेकचूडामणि
सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह
साधनपंचकम
भाष्य
अध्यात्म पटल भाष्य
ईशोपनिषद भाष्य
ऐतरोपनिषद भाष्य
कठोपनिषद भाष्य
केनोपनिषद भाष्य
छांदोग्योपनिषद भाष्य
तैत्तिरीयोपनिषद भाष्य
नृसिंह पूर्वतपन्युपनिषद भाष्य
प्रश्नोपनिषद भाष्य
बृहदारण्यकोपनिषद भाष्य
ब्रह्मसूत्र भाष्य
भगवद्गीता भाष्य
ललिता त्रिशती भाष्य
हस्तामलकीय भाष्य
मंडूकोपनिषद कारिका भाष्य
मुंडकोपनिषद भाष्य
विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र भाष्य
सनत्‌सुजातीय भाष्य

आदि शंकराचार्य की मृत्यु कैसे हुई?

विद्वानों का मानना है कि जब आदि शंकराचार्य जी की 32 वर्ष की उम्र में महासमाधि 820 ई. में हुई थी तब उन्होंने हिमालय से अपना सेवानिवृत्त किया और फिर केदारनाथ के पास एक गुफा में चले गए। ऐसा कहा जाता है कि जिस गुफा में वे प्रवेश किए थे, वहां वे दुबारा दिखाई नहीं दिए और यही कारण है, कि वह गुफा उनका अंतिम विश्राम स्थल माना जाता है।

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