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वरुण मुद्रा के फायदे और इसको करने का सही तरीका

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Benefits of Varun Mudra

Benefits of Varun Mudra : योग मुद्राएँ सिर्फ अध्यात्म की कुछ क्रियाएँ ही नहीं हैं बल्कि योग और योग मुद्राएँ सीधे हमारे स्वास्थ्य से संबंधित होती हैं। शरीर के संतुलित विकास के लिए ये उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जैसे भोजन से प्राप्त होने वाले पोषक तत्व होते हैं। इनके द्वारा मनुष्य का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार का विकास होता है।

प्राणायाम और ध्यान (मेडिटेशन) के समय हाथों की उँगलियों और अंगूठे अलग-अलग प्रकार से जोड़ने पर अलग-अलग मुद्रा का निर्माण होता है। चूँकि योग मुद्राएँ मस्तिष्क के अलग-अलग भाग को उत्प्रेरित (stimulate) करती हैं, इसलिए इनके द्वारा शरीर में प्राणायाम या मेडिटेशन से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का संचार की दिशा प्रभावित होती है। इन्हीं में से एक मुद्रा वरुण मुद्रा या जल मुद्रा होती है। जो हमारे शरीर में जल तत्व को प्रभावित करती है।

वरुण मुद्रा जल की कमी (डिहाइड्रेशन) से होने वाले सभी तरह के रोगों से बचाती है, साथ ही इसके कई और लाभ भी होते हैं। चलिए जानें मुद्रा करने का तरीका और इसके फायदे क्या हैं।

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क्या होती हैं मुद्राएं

दरअसल कुंडलिनी या ऊर्जा स्रोत को जाग्रत करने के लिए मुद्राओं का अभ्यास किया जाता है। कुछ मुद्राओं के अभ्यास से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। योगानुसार चरम अभ्यस्थता के साथ इसे करने से अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति हो सकती है। लेकिन साधारण रूप से इसका अभ्यास करने से भी कई फायदे होते हैं।

वरुण मुद्रा करने की विधि :

वरुण मुद्रा दो प्रकार की होती है। सबसे छोटी उंगली (कनिष्का) को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाने पर वरुण मुद्रा बनती है। दरअसल हाथ की सबसे छोटी उंगली को जल तत्व का प्रतीक माना जाता है और अंगूठे को अग्नि का। तो जल तत्व और अग्नि तत्व को एक साथ मिलाने से बदलाव होता है। बस आपको करना ये है कि, छोटी उंगली के सिरे को अंगूठे के सिरे से स्पर्श करते हुए धीरे से दबाएं। बाकी की तीन उंगुलियों को सीधा रखें।

वरुण मुद्रा करने के लाभ

यह शरीर के जल तत्व के संतुलित बनाए रखती है। आंत्रशोथ तथा स्नायु के दर्द और संकोचन से बचाव करती है। एक महीने तक रोजाना 20 मिनट तक इस मुद्रा का अभ्यास करने से ज्यादा पसीना आने और त्वचा रोग को दूर करने में सहायक होती है। यह साथ ही इसके नियमित अभ्यास से रक्त भी शुद्ध होता है और शरीर में रक्त परिसंचरण बेहतर होता है। शरीर को लचीला बनाने में भी वरुण मुद्रा उपयोग होती है। यह मुद्रा त्वचा को भी सुंदर बनाती है।

कब करें और कब ना करें

इस मुद्रा को सर्दी के मौसम में कुछ अधिक समय के लिए न करें। आप गर्मी या दूसरें मौसम में इस मुद्रा को 24 मिनट तक कर सकते हैं। वरुण मुद्रा को अधिक से अधिक 48 मिनट तक किया जा सकता है। जिन लोगों को सर्दी और जुकाम की शिकायद रहती है, उन्हे वरुण मुद्रा का अभ्यास अधिक समय तक नहीं करना चाहिए।

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वरुण मुद्रा के फ़ायदे :

वरुण मुद्रा जल की कमी (डिहाइड्रेशन) से होने वाले सभी तरह के रोगों से बचाती है, साथ ही इसके कई और लाभ भी होते हैं। सालों से इस योह मुद्रा का अभ्यास किया जाता रहा है और लोग इससे लाभान्वित होते रहे हैं। कमाल की बात तो ये है कि इस मुद्रा का अभ्यास आप कभी भी और कहीं भी कर सकते हैं। चलिए जानें मुद्रा करने के फायदे क्या हैं।

  • इस मुद्रा को करने से खून साफ होता है और चमड़ी के सारे रोग दूर होते है।
  • मुंह सूखने और त्वचा पर झुर्रिया पड़ने में यह फायदेमंद है।
  • इस मुद्रा के लगातार अभ्यास से शरीर का रूखापन दूर होता है।
  • इसको करने से शरीर में चमक बढ़ती है।
  • इस योग मुद्रा से आपके शरीर में पानी की कमी दूर होगी और शरीर में नमी बढ़ेगी।
  • वरुण मुद्रा को रोजाना करने से जवानी लंबे समय तक बनी रहती है और बुढ़ापा भी जल्दी नही आता।
  • ये मुद्रा प्यास को शांत करती है इसलिए गर्मी के लिए भी फायदेमंद है।
  • मन शांत होता है।
  • क्रोध और चिड़चिडेपन में कमी आती है।
Benefits of Varun Mudra
Benefits of Varun Mudra

इन रोगों के लिए है फायदेमंद :

  • हाइपरटेंशन
  • आँखों का सूखापन
  • पाचन तंत्र का सूखापन (मुंह, गले और आंतों)
  • खट्टी डकार
  • कब्ज
  • त्वचा में दरारें, शुष्क एक्जिमा, सोरायसिस, आदि के लिए अग्रणी का सूखापन
  • रक्ताल्पता
  • ऐंठन, निर्जलीकरण
  • अल्प पेशाब (पेशाब की कमी)
  • अल्प वीर्य (अल्पशुक्राणुता)
  • अल्प मासिक धर्म (Oligomenorrhoea)
  • जीभ-विकार ( स्वाद का पता ना चल पाना)

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सावधानी :

जिन लोगों को कफ़, पित्त, सर्दी, जुकाम या स्नोफिलिया रहता है उन्हे वरुण मुद्रा का अभ्यास ज्यादा समय तक नहीं करना चाहिए। एक्यूप्रेशर चिकित्सा के मुताबिक बाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली शरीर के बाएं हिस्से और दाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली शरीर के दाएं भाग को नियंत्रित करती है। दोनों के दबाव से शरीर का दायां और बायां भाग स्वस्थ और ताकतवर बनता है। इस मुद्रा में अंगूठें से छोटी उंगली की मालिश करने से शक्ति संतुलित होती है। बेहोशी टूट जाती है।

अस्वीकरण : आकृति.इन साइट पर उपलब्ध सभी जानकारी और लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए हैं। यहाँ पर दी गयी जानकारी का उपयोग किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या बीमारी के निदान या उपचार हेतु बिना विशेषज्ञ की सलाह के नहीं किया जाना चाहिए। चिकित्सा परीक्षण और उपचार के लिए हमेशा एक योग्य चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।

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