हेल्लो दोस्तों आज 17 नवंबर 2021 को विश्वेश्वर व्रत है। विश्वेश्वर भोले शंकर भगवान शिव को कहा जाता है। कर्नाटक में भगवान विश्वेश्वर मंदिर (Vishweshwar Vrat 2021), येलुरु श्री विश्वेश्वर मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर महाथोबारा येलुरु श्री विश्वेश्वर मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। धार्मिक पुराणों में, भगवान शिव को विश्वनाथ भी कहा गया है। यही कारण है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध भगवान विश्वेश्वर के 12वें ज्योतिर्लिंग का नाम रखा गया है। विश्वेश्वर व्रत, प्रदोष व्रत के दिन पड़ता है, जिसका पालन कार्तिक पूर्णिमा से पहले भीष्म पंचक के पाँच दिनों के त्यौहार के तीसरे दिन किया जाता है। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि भगवान विश्वेश्वर कुथ्यार राजवंश के सामंत राजा की भक्ति का सम्मान करते हुए भूमिगत से निकले थे।

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पूजन विधि :

भक्तों को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए।

भक्तों को इस दिन भगवान शिव से दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उपवास करना चाहिए।

इस दिन शिवलिंग पर फल, दूध और मिठाई का भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है।

भक्तों को अगले दिन सुबह ताजा खाना खाकर अपना व्रत तोड़ना चाहिए।

इस दिन भगवान शिव का महत्वपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करने के लिए मंदिर जाएँ।

Vishweshwar Vrat 2021
Vishweshwar Vrat 2021

विश्वेश्वर व्रत कथा :

कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में, कुथार राजवंश के एक शूद्र राजा, जिसे कुंडा राजा के रूप में भी जाना जाता था, ने एक बार भार्गव मुनि को अपने साम्राज्य में आमंत्रित किया था। हालांकि, भार्गव मुनि ने इसे यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि राज्य में मंदिरों और पवित्र नदियों की उपस्थिति का अभाव है।

कुंड राजा इस बात से इतने निराश हो गए कि उन्होनें अपने किसी सहायक के भरोसे राज्य छोड़ दिया और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक महान यज्ञ करने गंगा नदी के तट पर चले गए। कुंडा राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान शिव उनके राज्य में रहने की इच्छा से सहमत हुए।

जब भगवान शिव कुंडा राजा के राज्य में निवास कर रहे थे, तो एक आदिवासी महिला जंगल में खोए हुए बेटे की तलाश कर रही थी, उसने अपनी तलवार का इस्तेमाल एक कंद के पेड़ को काटने के लिए किया और उसमें से खून बहने लगा। तब उसे ऐसा लगा की वह कंद नहीं उसका पुत्र था और उसने अपने बेटे का नाम ‘येलु’ पुकारते हुए जोर से रोना शुरू कर दिया।

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ऐसे प्रकट हुए भगवान –

उस क्षण में, लिंग के रूप में भगवान शिव उस स्थान पर प्रकट हुए, और इस तरह से इस स्थान पर बने मंदिर का नाम येल्लुरु विश्वेश्वर मंदिर पड़ा। लिंग पर पड़ा वह निशान अभी भी देखा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि कुंडा राजा द्वारा उस पर नारियल का पानी डालने के बाद ही कंद का खून बहना बंद हुआ। भगवान शिव को नारियल पानी या नारियल का तेल चढ़ाना इस मंदिर का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। भगवान को चढ़ाया जाने वाला तेल मंदिर में दीपक जलाने के लिए रखा जाता है।

भीष्म पंचक के दौरान पांच दिन तक चलने वाले उत्सव में तुलसी विवाह भी शामिल है, जो हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। विश्वेश्वरा व्रत के अगले दिन वैकुंठ चतुर्दशी मनाई जाती है, और इस दिन भगवान शिव के भक्त पवित्र गंगा नदी के घाटों पर पवित्र मणिकर्णिका स्नान करते हैं।

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