कब है तुलसी विवाह? जानें तारीख, मुहूर्त, विवाह विधि और कथा

0
188

हेल्लो दोस्तों तुलसी विवाह हिन्दू धर्म का प्रमुख पर्व है। तुलसी विवाह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन मनाया जाता है. तुलसी विवाह में माता तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम के साथ किया जाता है। मान्यता है कि जो लोग कन्या सुख से वंचित होते हैं यदि वो इस दिन भगवान शालिग्राम से तुलसी जी का विवाह करें तो उन्हें कन्या दान के बराबर फल की प्राप्ति होती है. इस दिन से लोग सभी शुभ कामों की शुरुआत कर सकते हैं. कथा के बिना तुलसी विवाह अधूरा है. आइए जानते हैं तुलसी विवाह तारीख, मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व – Tulsi Vivah Katha Vidhi

ये भी पढ़िए : 23 नवम्बर को है आंवला नवमी, जानिये इसकी पूजा विधि, कथा और महत्त्व

कब है तुलसी विवाह? :

तुलसी विवाह हर साल कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन किया जाता है। साल 2020 में यह एकादशी तिथि 25 नवंबर को प्रारंभ होगी और 26 तारीख को समाप्त होगी। वहीं 26 नवंबर को तुलसी विवाह का आयोजन किया जाएगा। कई जगह द्वादशी के दिन भी तुलसी विवाह किया जाता है। कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी भी कहते हैं। 

Tulsi Vivah Katha Vidhi
Tulsi Vivah Katha Vidhi

तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त :

एकादशी तिथि प्रारंभ – 25 नवंबर, सुबह 2:42 बजे से 
एकादशी तिथि समाप्त – 26 नवंबर, सुबह 5:10 बजे तक
द्वादशी तिथि प्रारंभ – 26 नवंबर, सुबह 05 बजकर 10 मिनट से
द्वादशी तिथि समाप्त – 27 नवंबर, सुबह 07 बजकर 46 मिनट तक

ये भी पढ़िए : देवउठनी एकादशी कब है जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और महत्‍व

तुलसी विवाह की पूजन विधि :

  • तुलसी के पौधे के चारो ओर मंडप बनाएं।
  • तुलसी के पौधे के ऊपर लाल चुनरी चढ़ाएं।
  • तुलसी के पौधे को शृंगार की चीजें अर्पित करें।
  • श्री गणेश जी पूजा और शालिग्राम का विधिवत पूजन करें।
  • भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं।
  • आरती के बाद विवाह में गाए जाने वाले मंगलगीत के साथ विवाहोत्सव पूर्ण किया जाता है।
Tulsi Vivah Katha Vidhi
Tulsi Vivah Katha Vidhi

तुलसी विवाह की कथा :

पौराणिक मान्यता के अनुसार, राक्षस कुल में एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम वृंदा था। वह बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्ति और साधना में डूबी रहती थीं। जब वृंदा विवाह योग्य हुईं तो उसके माता-पिता ने उसका विवाह समुद्र मंथन से पैदा हुए जलंधर नाम के राक्षस से कर दिया। भगवान विष्णु जी की सेवा और पतिव्रता होने के कारण वृंदा के पति जलंधर बेहद शक्तिशाली हो गया। सभी देवी-देवता जलंधर के आतंक से डरने लगे।

जलंधर जब भी युद्ध पर जाता वृंदा पूजा अनुष्ठान करने बैठ जातीं। वृंदा की विष्णु भक्ति और साधना के कारण जलंधर को कोई भी युद्ध में हरा नहीं पाता था। एक बार जलंधर ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी जिसके बाद सारे देवता जलंधर को परास्त करने में असमर्थ हो रहे थे। तब हताश होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को खत्म करने पर विचार करने लगे।  

ये भी पढ़िए : गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते समय भूलकर भी ना करें ये गलतियाँ

भगवान विष्णु ने किया छल :

तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति कम होती गई और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को शिला यानी पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। भगवान को पत्थर का होते देख सभी देवी-देवताओं में हाहाकार मच गया फिर माता लक्ष्मी ने वृंदा से प्रार्थना की तब जाकर वृंदा ने अपना श्राप वापस ले लिया और खुद जलांधर के साथ सती होकर भस्म हो गईं।

Tulsi Vivah Katha Vidhi
Tulsi Vivah Katha Vidhi

जब वे सती हुईं, तो कहते हैं कि उनके शरीर की भस्म से तुलसी का पौधा बना। फिर उनकी राख से एक पौधा निकला जिसे भगवान विष्णु ने तुलसी नाम दिया और खुद के एक रूप को पत्थर में समाहित करते हुए कहा कि आज से तुलसी के बिना मैं कोई भी प्रसाद स्वीकार नहीं करूंगा। इस पत्थर को शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा। तभी से कार्तिक महीने में तुलसी जी का भगवान शालिग्राम के साथ विवाह भी किया जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here