पुत्रदा एकादशी व्रत कथा, पूजा विधि एवं शुभ मुहूर्त, पुत्र प्राप्ति के लिए करें ये व्रत

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हिंदू पंचांग की एकादशी तिथि चाहे वह कृष्ण पक्ष की या शुक्ल पक्ष की, हिंदू धर्म में उसका महत्व बहुत अधिक होता है। प्रत्येक माह की कृष्ण और शुक्ल एकादशियां अपने आप में खास होती हैं। एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है और उपवास भी रखा जाता है। Shravana Putrada Ekadashi Vrat Katha

पुत्रदा एकादशी व्रत 30 जुलाई को है. सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी भी कहा जाता है. इस व्रत का पुण्य वाजपेयी यज्ञ के समान बताया गया है.

श्रावण और पौष मास की एकादशियों का महत्व एक समान माना जाता है। इन एकादशियों को संतान प्राप्ति के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। श्रावण मास की एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। आइये जानते हैं श्रावण शुक्ल एकादशी की व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।

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श्रावण पुत्रदा एकादशी की पूजा एवं व्रत विधि :

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें तथा स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • भगवान् विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीप जलाएं
  • पूजा में तुलसी, ऋतु फल एवं तिल का प्रयोग करें
  • व्रत के दिन निराहार रहें और शाम में पूजा के बाद चाहें तो फल ग्रहण कर सकते हैं
  • विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है
  • एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। जागरण में भजन कीर्तन करें
  • द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद उन्हें दान-दक्षिणा दें
  • अंत में स्वयं भोजन करें
Devshayani Ekadashi 2020
Shravana Putrada Ekadashi Vrat Katha

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा – Shravana Putrada Ekadashi Vrat Katha

श्रावण पुत्रदा की व्रत कथा कुछ इस प्रकार है। बात उस समय की है जब युद्धिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से एकादशी व्रत के महत्व व इसकी कहानी के बारे में जान रहें थे। जिज्ञासावश उन्होंने श्रावण एकादशी के महत्व को बताने का आग्रह भगवान श्री कृष्ण किया। तब श्री कृष्ण कथा कुछ यूं कहते हैं। हे राजन् श्रावण शुक्ल एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। अब मैं जो कथा तुम्हें सुनाने जा रहा हूं इसे सुनने के पश्चात तुम इसके महत्व को स्वयं ही समझ सकोगे।

बात बहुत समय पहले की है कि है लगभग द्वापर के आरंभ की, माहिष्मति नाम की एक नगरी होती थी जिसमें बहुत ही नेमी-धर्मी राजा महीजित का राज्य था। राजा अपनी प्रजा को पुत्र की तरह प्रेम से रखता था, उनकी सुख-सुविधाओं का, न्याय का, ब्राह्मणों के सम्मान का, दान-पुण्य का उसे भली प्रकार से ज्ञान रहता।

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सब कुछ अच्छे से चल रहा था लेकिन विवाह के कई वर्ष बीत जाने के पश्चात भी उसकी अपनी कोई संतान नहीं थी यह बात राजा महीजित को अक्सर परेशान करती थी। जैसे-जैसे उम्र बीत रही थी राजा की चिंता और बड़ा रूप लेने लगी थी। फिर एक दिन उसने दरबार में ज्ञानवान ब्राह्मणों, पुजारी-पुरोहितों को बुलवाया, प्रजाजन भी उपस्थित थे।

राजा ने सभी के समक्ष विनम्रता से कहा हे ज्ञानियों, प्रजाजनों, ब्राह्मण देवताओ मैंने जब से होश संभाला है तब से लेकर आज जबकि मुझे राज्य की बागडोर संभाले भी एक अरसा हो गया है। मैनें अधर्म का कोई कार्य नहीं किया है। धर्म कर्म दान पुण्य न्याय-अन्याय का पूरा विचार मुझे रहा है। यह भी सही है कि मेरी प्रजा मुझे पुत्र के समान ही प्रिय है लेकिन विधि ने मुझे संतानहीन कौनसे पाप की वजह से रखा है मैं समझ नहीं पाया हूं।

Shravana Putrada Ekadashi 2020
Shravana Putrada Ekadashi Vrat Katha

प्रजा भी राजा के यहां संतान न होने से दुखी तो पहले से ही थी लेकिन राजा के इस प्रकार अपनी व्यथा प्रकट करने से तो वह और भी द्रवित हो गई। सभी की आंखों से अश्रुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। राजा ने विद्वान ब्राह्मणों पुरोहितों से अनुरोध किया कि वे कोई उपाय बतायें कि किस प्रकार उन्हें संतान का सुख मिल सकता है।

राजा इतने धर्मात्मा थे कि उनमें कोई पाप नज़र ही नहीं आ रहा था तो वे उन्हें क्या बतायें समझ नहीं आ रहा था। तभी किसी ने कहा कि इसके लिये हमें मुनि लोमेश की सहायता लेनी चाहिये। वहीं इस समय सर्वश्रेष्ठ मुनि हैं, सनातन धर्म की गूढ़ गुत्थियों को सुलझाने में वे ही सबके सहायक हैं। उनके तपोबल से ही एक कल्प बीतने पर उनका मात्र एक रोम मात्र गिरता है। फिर क्या था सभी जाकर मुनि लोमेश को प्रणाम किया। अब ऋषि तो अंतर्यामी होते हैं फिर भी पूछ लिया कि कहिये क्या कष्ट है मैं आपकी अवश्य सहायता करूंगा, मेरा उद्देश्य ही परोपकार है।

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मौजूद सभी विद्वानों प्रजाजनों ने अपनी व्यथा प्रकट की कि उनके धर्मात्मा राजा पर यह कैसा संकट है और कैसे वे इससे ऊभर सकते हैं। मुनि ने क्षण भर के लिये अपने नेत्र बंद किये और अगला पिछला सबकुछ जान लिया। तब उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में राजा एक बहुत ही गरीब व्यापारी होता था, छल और पापकर्मों से उसने संपत्ति एकत्रित की, लेकिन ज्येष्ठ माह में द्वादशी को मध्याह्न के समय जबकि उस समय वह दो दिन से भूखा प्यासा था, उसे एक जलाशय दिखाई दिया, वहीं पर एक गाय भी पानी पी रही थी, तब उसे गौ को वहां से हटाकर स्वयं की प्यास बुझाई।

अंजाने ही एकादशी उपवास संपन्न करने से वह राजा बना और प्यासी गाय को जल पीने से रोकने के लिये उसे संतानहीन होना पड़ा। यह जानकर सब बहुत दुखी हुए और कहा हे मुनिवर हर पाप के प्रायश्चित का रास्ता भी आप जैसे पंहुचे मुनि को मालूम होता है हमें भी कोई उपाय बतायें जिससे हमारे राजा का संकट दूर हो। तब उन्होंने कहा कि एक रास्ता है यदि सभी प्रजाजन मिलकर श्रावण शुक्ल एकादशी जो कि पुत्रदा एकादशी भी होती है को उपवास रखकर रात्रि में जागरण करें

Shravana Putrada Ekadashi Vrat Katha

अगले दिन पारण कर इसका पुण्य राजा को दें तो बात बन सकती है। मुनि का आशीर्वाद लेकर सभी वापस लौट आये। कुछ समय पश्चात ही श्रावण शुक्ल एकादशी का दिन आया सभी ने विधिनुसार उपवास रखा और मुनि के बताये अनुसार ही व्रत का पुण्य राजा को दे दिया। जल्द ही रानी उम्मीद से हो गई और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

श्रावण पुत्रदा एकादशी का महत्व :

हिन्दू धर्म में एकादशी बहुत ही महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है और श्रावण पुत्रदा एकादशी उनसें से एक है। ऐसा विश्वास है कि यदि नि:संतान दंपति इस व्रत को पूर्ण विधि-विधान व श्रृद्धा के साथ धारण करें तो उन्हें संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है। इसके अलावा मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है और मरणोपरांत उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि श्रावण शुक्ल एकादशी माहात्म्य को सुनने, जानने मात्र से ही समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। इहलोक में भौतिक सुख-सुविधाएं तो मिलती ही हैं परलोक भी सुधर जाता है।

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