जानें कब है सर्व पितृ अमावस्या, तर्पण का शुभ मुहूर्त और महत्त्व

हेलो फ्रेंड्स, पितृ पक्ष में अमावस्या तिथि का विशेष महत्त्व है। आइए जानें इस साल कब पड़ेगी सर्व पितृ अमावस्या (Sarva Pitru Amavasya 2021) और किस तरह तर्पण करना शुभ होगा। हिंदू धर्म के अनुसार पितृ पक्ष का विशेष महत्त्व है। पितृ 16 दिन हमारे मृत पूर्वजों को समर्पित होते हैं और इस दौरान उन्हें जल और भोजन अर्पित करने की प्रथा है। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान यदि मृत पूर्वज प्रसन्न हो जाते हैं तो सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं और यदि वो किसी वजह से अप्रसन्न होते हैं तो पितृ दोष हो जाता है जिससे बनते हुए कार्य भी बिगड़ने लगते हैं। इसलिए लोग पितृ दोष से बचने के लिए कई प्रयासों से पूर्वजों को प्रसन्न करते हैं।

लेकिन ऐसी मान्यता है कि यदि किसी वजह से आपसे कोई भूल चूक हो जाती है तो इससे बचने के लिए सर्व पितृ अमावस्या के दिन एक साथ पूर्वजों को तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष का समापन अश्विन मास की अमावस्या तिथि को होता है। इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या या महालय अमावस्या भी कहा जाता है। मान्यतानुसार इस दिन पितरों के श्राद्ध का अंतिम दिन होता है। आइए नई दिल्ली के जाने माने पंडित, एस्ट्रोलॉजी, कर्मकांड, पितृदोष और वास्तु विशेषज्ञ प्रशांत मिश्रा जी से जानें कि जानें इस साल पितृ पक्ष की अमावस्या यानी कि सर्वपितृ अमावस्या कब (kab hai sarva pitru amavasya) पड़ रही है और किस मुहूर्त में तर्पण या श्राद्ध करना शुभ होगा।

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सर्व पितृ अमावस्या की तिथि और शुभ मुहूर्त :

अमावस्या तिथि शुरू: शाम 19:04 बजे ( 05 अक्तूबर 2021) से

अमावस्या तिथि समाप्त: दोपहर 16 :34 बजे (06 अक्तूबर 2021) तक

सर्व पितृ अमावस्या के श्राद्ध का महत्त्व :

पितृ पक्ष की प्रत्येक तिथि में विधि विधान से श्राद्ध किया जाता है। लेकिन अमावस्या तिथि का विशेष महत्त्व है क्योंकि इस दिन श्राद्ध करने से पूरे 16 दिनों के श्राद्ध का फल एक साथ मिलता है। यदि किसी वजह से मृत पूर्वजों की देहांत की तिथि न तो इस दिन श्राद्ध करने से उन्हें मुक्ति मिलती है। मान्यतानुसार इस दिन ज्ञात, अज्ञात सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध करने का विधान है। कहा जाता है कि इस दिन सही विधि से किए गए श्राद्ध से पितरों की आत्मा को मुक्ति मिलती है और वो अपने परिजनों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन जो जल पितरों को तर्पण किया जाता है वो सीधा पितरों को मिलता है।

Sarva Pitru Amavasya 2021
Sarva Pitru Amavasya 2021

सर्व पितृ अमावस्या में कैसे करें श्राद्ध (amavasya me shradh):

वैसे तो सभी पितरों की श्राद्ध एक साथ सर्व पितृ अमावस्या के दिन किया जा सकता है लेकिन इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने का विशेष महत्त्व है। श्राद्ध करते समय घर की दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके पितरों को तर्पण करें और इसके बाद ब्राह्मणों के लिए जो भोजन बनाएं उसमें से 5 हिस्से निकालें जिसे देवताओं, गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए निकालें। इसके बाद ब्राह्मणों को खीर,पूड़ी और पितरों की पसंद की अन्य चीजें श्रद्धा पूर्वक खिलाएं। इसके बाद ब्राह्मणों को वस्त्र-दक्षिणा देकर विदा करें और पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें। इस प्रकार मृत पूर्वजों को याद करते हुए तर्पण करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

अमावस्या में दीप प्रज्ज्वलित करने का महत्त्व :

मान्यता है कि सर्व पितृ अमावस्या के दिन हवन करके पितरों को विदाई दी जाती है और इस दिन दीप प्रज्जवलित करने का अलग महत्त्व है। कहा जाता है कि इस दिन पितरों के नाम का दीपकजलाने से उन्हें मुक्ति मिलती है और वो प्रसन्न होकर अपने लोक वापस चले जाते हैं। दीप प्रज्ज्वलित करने के लिए सूर्यास्त के बाद घर की दक्षिण दिशा में तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इस प्रकार सर्व पितृ अमावस्या में श्राद्ध और तर्पण करना विशेष रूप से फलदायी होगा और इस तरह पितरों का पूजन करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होगी।

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इस विधि से करें पितरों का तर्पण :

पितृ अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर बिना साबुन लगाए स्नान करें और फिर साफ-सुथरे कपड़े पहनें। पितरों के तर्पण के निमित्त सात्विक पकवान बनाएं और उनका श्राद्ध करें। शाम के समय सरसों के तेल के चार दीपक जलाएं। इन्हें घर की चौखट पर रख दें। एक दीपक लें। एक लोटे में जल लें। अब अपने पितरों को याद करें और उनसे यह प्रार्थना करें कि पितृपक्ष समाप्त हो गया है इसलिए वह परिवार के सभी सदस्यों को आशीर्वाद देकर अपने लोक में वापस चले जाएं। यह करने के पश्चात् जल से भरा लोटा और दीपक को लेकर पीपल की पूजा करने जाएं। वहां भगवान विष्णु जी का स्मरण कर पेड़ के नीचे दीपक रखें जल चढ़ाते हुए पितरों के आशीर्वाद की कामना करें। पितृ विसर्जन विधि के दौरान किसी से भी बात ना करें। 

Sarva Pitru Amavasya 2021
Sarva Pitru Amavasya 2021

सर्व पितृ अमावस्या का महत्व :

देवताओं के पितृगण ‘अग्निष्वात्त’ जो सोमपथ लोक मे निवास करते हैं। उनकी मानसी कन्या, ‘अच्छोदा’ नाम की एक नदी के रूप में अवस्थित हुई। एक बार अच्छोदा ने एक हज़ार वर्ष तक निर्बाध तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर दिव्यशक्ति परायण देवताओं के पितृगण ‘अग्निष्वात्त’ अच्छोदा को वरदान देने के लिए दिव्य सुदर्शन शरीर धारण कर आश्विन अमावस्या के दिन उपस्थित हुए।

उन पितृगणों में ‘अमावसु’ नाम की एक अत्यंत सुंदर पितर की मनोहारी-छवि यौवन और तेज देखकर अच्छोदा कामातुर हो गयी और उनसे प्रणय निवेदन करने लगीं किन्तु अमावसु अच्छोदा की कामप्रार्थना को ठुकराकर अनिच्छा प्रकट की, इससे अच्छोदा अति लज्जित हुई और स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरी। अमावसु के ब्रह्मचर्य और धैर्य की सभी पितरों ने सराहना की एवं वरदान दिया कि यह अमावस्या की तिथि ‘अमावसु’ के नाम से जानी जाएगी। जो प्राणी किसी भी दिन श्राद्ध न कर पाए वह केवल अमावस्या के दिन श्राद्ध-तर्पण करके सभी बीते चौदह दिनों का पुण्य प्राप्त करते हुए अपने पितरों को तृप्त कर सकते हैं। तभी से प्रत्येक माह की अमावस्या तिथि को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है और यह तिथि ‘सर्वपितृ श्राद्ध’ के रूप में भी मनाई जाती है। 

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