कब है सफला एकादशी, जानें तिथि, मुहूर्त, व्रत विधि और महत्व

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हेल्लो दोस्तों हिन्दू पंचांग की ग्यारहवी तिथि को एकादशी कहते हैं यह तिथि मास में दो बार आती है पूर्णिमा के बाद और अमावस्या के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। Safla Ekadashi Vrat 2021

हिन्दू पंचांग के अनुसार, पौष मास कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को सफला एकादशी (सफलता एकादशी) कहा जाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने सफला एकादशी तिथि को अपने ही समान बलशाली बताया है।  आइए जानते हैं सफला एकादशी व्रत विधि, मुहूर्त, महत्व और कथा। 

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पिछले साल यानी साल 2020 को सफला एकादशी नहीं पड़ी थी जिसके चलते इस साल दो सफला एकादशी पड़ेंगी. पहली एकादशी पौष मास कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 09 जनवरी, शनिवार को जबकि दूसरी 30 दिसंबर 2021, गुरुवार को पड़ेगी. इस दिन भगवान विष्णु जी का आशीर्वाद पाने के लिए सफला एकादशी का व्रत रखा जाएगा।

धार्मिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति सफला एकादशी का व्रत रखता है। उसकी सभी मनोकामनाएं सफल होती हैं। सफला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु जी के लिए रखा जाता है। इस दिन विधिवत उनकी आराधना होती है।

Safla Ekadashi Vrat 2021
Safla Ekadashi Vrat 2021

सफला एकादशी मुहूर्त :

एकादशी तिथि प्रारम्भ – जनवरी 08, 2021 को रात 9:40 बजे
एकादशी तिथि समाप्त – जनवरी 09, 2021 को शाम 7:17 बजे तक

सफला एकादशी व्रत विधि :

  • सफला एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान कर सूर्यदेव को जल दें।
  • इसके बाद व्रत-पूजन का संकल्प लें। 
  • सुबह भगवान अच्युत की पूजा-अर्चना करें।
  • भगवान को धूप, दीप, फल और पंचामृत आदि अर्पित करें। 
  • नारियल, सुपारी, आंवला अनार और लौंग आदि से भगवान अच्युत को अर्पित करें। 
  • रात्रि जागरण कर श्री हरि के नाम के भजन करें।
  • अगले दिन द्वादशी पर गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराएं, उन्हें दान-दक्षिणा देकर व्रत खोलें।
  • इस दिन सौंफ और मिश्री अर्पित करें और इसे रोज सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण करें.

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सफला एकादशी की कथा :

पद्म पुराण में सफला एकादशी की जो कथा मिलती है उसके अनुसार प्राचीन काल में चंपावती नगर में महिष्मित नाम का एक राजा था। राजा के 4 पुत्र थे इनका ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक पाप कर्मों में लिप्त रहता था और दुष्ट प्रवृति का था। वह पिता के धन को कुकर्मों में नष्ट करता था इससे नाराज होकर एक दिन राजा ने अपने पुत्र को देश से बाहर निकाल दिया। लुम्पक जंगल में रहने लगा।

पौष कृष्ण दशमी की रात में ठंड के कारण वह सो न सका। सुबह होते होते ठंड से लुम्पक बेहोश हो गया। आधा दिन गुजर जाने के बाद जब बेहोशी दूर हुई तब जंगल से फल इकट्ठा करने लगा। शाम में सूर्यास्त के बाद यह अपनी किस्मत को कोसते हुए भगवान को याद करने लगा। इस दौरान वह भटकता हुआ एक साधू की कुटिया पर पहुँच गया। सौभाग्य से उस दिन “सफला एकादशी” थी महात्मा ने उसे खाना खिलाया महात्मा के इस व्यवहार से उसकी बुद्धि परिवर्तित हो गई। वह साधू के चरणों में गिर गया तो साधू ने उसे अपना शिष्य बना लिया। धीरे धीरे उसका चरित्र निर्मल हो गया।

Safla Ekadashi Vrat 2021

वह महात्मा की आज्ञा से वह एकादशी का व्रत रखने लगा इस तरह अनजाने में ही लुम्पक से सफला एकादशी का व्रत पूरा हो गया। इस व्रत के प्रभाव से लुम्पक सुधर गया और इनके पिता ने अपना सारा राज्य लुम्पक को सौंप दिया और खुद तपस्या के लिए चले गए। काफी समय तक धर्म पूर्वक शासन करने के बाद लुम्पक भी तपस्या करने चला गया और मृत्यु के पश्चात विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ।

सफला एकादशी पर क्या न करें :

  • इस एकादशी के दिन बिस्तर पर नहीं, बल्कि जमीन पर सोना चाहिए।
  • मांस, नशीली वस्तु, लहसुन, प्याज का सेवन ना करें।
  • सफला एकादशी की सुबह दातुन करना भी वर्जित माना गया है।
  • कामवासना का त्‍याग करें।
  • कांसे के बर्तन में भोजन न करें।
  • जो लोग एकादशी का व्रत नहीं कर रहे हैं उन्‍हें भी इस दिन चावल और उससे बने पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। 
  • इस दिन किसी पेड़ या पौधे की फूल पत्ती तोड़ना भी अशुभ माना गया है।

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सफला एकादशी का महत्व :

पद्म पुराण में सफला एकादशी व्रत का महत्व बताया गया है। स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया है कि सफला एकादशी व्रत के देवता श्री नारायण हैं। जो व्यक्ति सफला एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करता है और रात्रि में जागरण करता है, ईश्वर का ध्यान और श्री हरि के अवतार एवं उनकी लीला कथाओं का पाठ करता है उनका व्रत सफल होता है। इस प्रकार से सफला एकादशी का व्रत करने वाले पर भगवान प्रसन्न होते हैं।

व्यक्ति के जीवन में आने वाले दुःखों को पार करने में भगवान सहयोग करते हैं। जीवन का सुख प्राप्त कर व्यक्ति मृत्यु के पश्चात सद्गति को प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि एक हजार अश्वमेघ यज्ञ मिल कर भी इतना लाभ नहीं दे सकते जितना सफला एकादशी का व्रत रख कर मिल सकता है।

Dev Uthani Ekadashi 2020

पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी तिथि का महत्त्व समझाते हुए बताया है कि सभी व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने जनकल्याण के लिए अपने शरीर से पुरुषोत्तम मास की एकादशियों सहित कुल 26 एकादशियों को उत्पन्न किया। इसलिए एकादशी तिथि में नारायण के समान ही फल देने का सामर्थ्य है। एकादशी व्रत के बाद भगवान विष्णु की पूजा-आराधना करने वालों को किसी और पूजा की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि ये अपने भक्तों के सभी मनोरथों की पूर्ति कर उन्हें विष्णु लोक में स्थान देते हैं। 

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