Rambha Teej Vrat 2021
Rambha Teej Vrat 2021
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हेल्लो दोस्तों, हिन्दी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रंभा तृतीया या रंभा तीज व्रत (Rambha Teej Vrat) रखा जाता है। इस वर्ष 02 जून 2022 दिन गुरुवार को रंभा तीज मनाई जाएगी। इस व्रत के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग, विडाल योग का निर्माण हो रहा है. रंभा तीज के दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और व्रत करते हुए भगवान शिव, माता पार्वती और माता लक्ष्मी की विधि विधान से पूजा करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधिविधान से पूजा और व्रत रखने वाले जातक के जीवन में प्रेम, सौंदर्य और सौभाग्य बढ़ता है।

पौराणिक कथाओं और हिन्दू मान्यता के अनुसार अप्सरा रंभा (Apsara Rambha) की उत्पति देवों और असुरों द्वारा समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए 14 रत्नों में से एक रंभा भी थीं, जो बेहद सुंदर थी। इस दिन अप्सरा रंभा की पूजा की जाती है। इस तीज व्रत को अप्सरा रंभा ने भी सौभाग्य प्राप्ति के लिए किया था, इसलिए इस व्रत को रंभा तीज/रम्भा तृतीया (Rambha Teej) के नाम से जाना जाता है। महिलाएं सौभाग्य एवं सुख की प्राप्ति के लिए इस दिन तीज व्रत रखती हैं। इस व्रत को रखने से औरतों का सुहाग और कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है। रंभा तीज का व्रत फलदायी होता है।

रंभा तीज शुभ मुहूर्त (Rambha Teej Shubh Muhurt)

  • रंभा तीज तिथि : 02 जून 2022, दिन गुरुवार।
  • तृतीया तिथि का आरंभ : 01 जून, बुधवार को रात्रि 09 बजकर 47 मिनट से।
  • तृतीया तिथि का समापन : 03 जून, शुक्रवार को रात्रि 12 बजकर 17 मिनट पर।
Rambha Teej Vrat
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रंभा तीज व्रत विधि (Rambha Teej Vrat Vidhi)

  • रंभा तृतीया के दिन सूर्योदय से पहले उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • इसके बाद पूजा स्थल पर पूर्व दिशा में मुंह करके पूजा के लिए बैठें।
  • सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें और पूजा में घी के पांच दीपक जलाएं।
  • इसके बाद स्वच्छ आसन पर भगवान शिव-पार्वती की मूर्ति स्थापित करें।
  • पूजन के दौरान ॐ महाकाल्यै नम:, ॐ महालक्ष्म्यै नम:, ॐ महासरस्वत्यै नम: आदि मंत्रों का जाप करें।
  • अब भगवान शिव पर चंदन, गुलाल और फूल समेत अन्य चीजें एवं माता पार्वती पर चंदन, हल्दी, मेहंदी, अक्षत, लाल फूल समेत सोलह श्रृंगार की वस्तुएं चढ़ाएं।
  • इस दिन विवाहित महिलाएं माता लक्ष्मी और माता सती को प्रसन्न करने के लिए पूरे विधि-विधान से पूजा करती हैं।
  • इनके साथ ही सौभाग्य और सुंदरता की प्रतीक मानी जाने वाली अप्सरा रंभा का भी पूजा किया जाता है।
  • रंभा तृतीया के दिन विधिपूर्वक पूजन और मंत्रोच्चारण से व्यक्ति को जीवन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य और सौंदर्य की प्राप्ति होती है।
  • इस दिन कुछ जगहों पर चूड़ियों के जोड़े को रंभा के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। साथ ही इस दिन रंभोत्कीलन यंत्र की भी पूजा की जाती है।
  • यह व्रत शादीशुदा महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और बुद्धिमान संतान के लिए तो कुंवारी कन्याएं अपने मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं।
  • यह व्रत जिस घर में किया जाता है, वहां सुख-समृद्धि, शांति, सुंदरता, पति को लंबी उम्र और सभी मनोकामना पूर्ण होती है।

इस मंत्र का जाप करें (Rambha Teej Mantra)

ॐ ! रंभे अगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते

कौन है रंभा और कैसे हुई इनकी उत्पत्ति (Who Is Rambha)

पुराणों में रंभा का चित्रण एक प्रसिद्ध अप्सरा के रूप में हुआ है। उसकी उत्पत्ति देवताओं और असुरों द्वारा किए गए विख्यात सागर मंथन से मानी जाती है। अमृत मंथन में निकले चौदह रत्नों में रंभा का आगमन समुद्र मंथन से होने के कारण यह अत्यंत ही पूजनीय हैं। समस्त लोकों में इनका गुणगान होता है। देव असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के ये चौदह रत्नों का वर्णन इस प्रकार है।

  • लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुराधन्वन्तरिश्चन्द्रमाः।
  • गावः कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवांगनाः।

शास्त्रों में बताया गया है कि अप्सराओं का संबंध स्वर्ग से होता है। अप्सराओं के पास दिव्य शक्तियां होती हैं, जिनसे यह किसी को भी सम्मोहित कर सकती हैं। ऋग्वेद में प्रसिद्ध उर्वशी अप्सरा का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा धार्मिक कथाओं के अनुसार तपस्या में लीन ऋषि-मुनियों की तपस्या को भंग करने के लिए इंद्र अप्सराओं का आहवान करते थे। अप्सराओं में रंभा, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका आदि के नाम सुनने को मिलते हैं। पुराणों में बताया गया है कि एक बार देवराज इंद्र ने रंभा को ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा था। महर्षि ने उसे एक सहस्त्र वर्ष तक पाषाण के रूप में रहने का श्राप दिया।

रावण को दिया था श्राप

रम्भा को इंद्र ने अपनी राजसभा के लिए प्राप्त किया था। वह स्वर्ग की अप्सरा थी. जो तमाम नृत्यों और कई कलाओं को जानती थी. रम्भा नलकुबेर की पत्नी थी. रावण और कुबेर दोनों भाई थे. कुबेर के पुत्र का नाम था नलकुबेर था। रम्भा का विवाह नलकुबेर से हुआ था। और इस रिश्ते से वह रावण की पुत्रवधू लगती थी।

एक दिन जब रावण की नजर रम्भा की सुंदरता पर मोहित हो गया और उसने रम्भा से आपत्तिजनक बातें पूछी। रावण ने रम्भा से पूछा कि वह इतना सज-धज कर किसको तृप्त करने जा रही है? रावण ने इसके लिए संस्कृत में ‘भोक्ष्यते’ शब्द का प्रयोग किया।

रम्भा ने रावण को रिश्ते-नातों की याद दिलाई। रावण ने पहले तो मानने से इनकार कर दिया कि वह उसकी पुत्रवधू है, लेकिन जब रम्भा ने नलकुबेर के बारे में बताया, तो रावण ने इस बात को भी नहीं माना। उस समय रम्भा काफ़ी डरी हुई थी और उसे पता था कि वह कुछ भी कर सकता है। डर से काँप रही रम्भा को शायद यह नहीं पता था कि रावण अपनी दुष्टता के कारण रिश्तों-नातों की भी परवाह नहीं करेगा।

पुराणों के अनुसार और वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण’ के अनुसार, रावण ने रम्भा का बलात्कार किया था तब रंभा ने रावण को श्राप दिया कि अगर वह किसी भी महिला को उसके इच्छा के विरूध छूता है, तो उसके दसों सर उसी वक्त फट जाएगें। द्वापर युग मे रंभा का विवाह ऋषि शेशिरायनण के साथ हुआ था। उन दोनो को एक पुत्र भी था जो कालयवन के नाम से जाना गया, पुत्र के जन्म के बाद रंभा स्वर्ग लोक वापस चली गयी।

Rambha Teej Vrat
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रंभा तीज व्रत करने के लाभ (Benefits Of Rambha Teej Vrat)

  • रंभा तीज के दिन पूजा करने से बड़ी से बड़ी बीमारी से भी छुटकारा मिलता है और युवा और स्वस्थ रहने में मदद मिलती है।
  • ऐसा कहा जाता है कि जिन लोगों पर रंभा की कृपा होती है, वे आकर्षक, सुंदर (खूबसूरत) और आसानी से लोगों पर विजय प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।
  • इस व्रत को करने वाले जातक की हर मनोकामना पूर्ति की प्राप्ति होती है।
  • इस व्रत के प्रभाव से जातक अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह कर सकेगा।
  • कुछ तांत्रिक उनका पूजन तकनीक (सम्मोहन शक्ति) सीखने के लिए करते हैं जो लोगों को सम्मोहित करने में मदद करती है।

रंभा तीज व्रत कथा (Rambha Teej Vrat Katha)

रम्भा को श्री लक्ष्मी का रुप और शक्ति का स्वरुप माना गया है। ऎसे में इस दिन रम्भा का पूजन करके भक्त को सब कुछ प्राप्त होता है। रम्भा तीज व्रत के लिए एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार प्राचीन समय मे एक ब्राह्मण दंपति सुख पूर्वक जीवन यापन कर रहे होते हैं। वह दोनों ही श्री लक्ष्मी जी का पूजन पूरी विधिवत किया करते थे।

एक दिन ब्राह्मण को किसी कारण से नगर से बाहर जाना पड़ता है। वह अपनी स्त्री को समझाकर अपने कार्य के लिए नगर से बाहर निकल पड़ता है। इधर ब्राह्मणी बहुत दुखी रहने लगती है। पति के बहुत दिनों तक नहीं लौट आने के कारण वह बहुत शोक और निराशा में घिर जाती है।

एक रात्रि उसे स्वप्न आता है कि उसके पति की दुर्घटना हो गयी है। वह स्वप्न से जागकर विलाप करने लगती है। तभी उसका दुख सुनकर देवी लक्ष्मी एक वृद्ध स्त्री का भेष बनाकर वहां आती हैं और उससे दुख का कारण पूछती है। ब्राह्मणी उस वृद्ध स्त्री को सारी बात विस्तार से बताती हैं।

तब वृद्ध स्त्री उसे ज्येष्ठ मास में आने वाली रम्भा तृतीया का व्रत करने को कहती है। ब्राह्मणी उस स्त्री के कहे अनुसार रम्भा तृतीया के दिन व्रत एवं पूजन करती है और व्रत के प्रभाव से उसका पति सकुशल पुन: घर लौट आता है। जिस प्रकार रम्भा तीज के प्रभाव से ब्राह्मणी के सौभाग्य की रक्षा होती है, उसी प्रकार सभी के सुहाग की रक्षा हो।

रंभा तीज व्रत का महत्व (Rambha Teej Vrat Mahatva)

शास्त्रों में रंभा तीज व्रत करने का बहुत महत्त्व बताया है. रंभा तीज व्रत करने से महिलाओं के सौभाग्य में बढ़ोत्तरी होती है। इस व्रत के प्रभाव से पति की उम्र बढ़ती है और संतान सुख मिलता है। इस दिन व्रत रखने और दान करने से जातक की सारी मनोकामना पूरी होती है। रंभा तीज रखने वाली महिलाएं सदा निरोगी रहती हैं और उनकी उम्र और सुंदरता दोनों बढ़ती हैं। जिस घर में ये व्रत किया जाता है, वहां हमेशा सुख, समृद्धि और शांति रहती है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, रंभा एक अप्सरा हैं जिनकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी। रंभा को सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है इसलिए सुंदर यौवन की प्राप्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है। कहते है कि सौन्दर्य, आकर्षण ओर तेजस्व से परिपूर्ण रम्भा की साधना करने से साधक का शरीर अनेक प्रकार के रोगो से मुक्ति पाकर प्रज्वलित सौन्दर्य प्राप्त करता है। भारत में रम्भा नाम से तीज भी मनाई जाती है। इस दिन विवाहित स्त्रियां व्रत कर अनाज, फूल ओर सभी श्रृंगार सामग्री की पूजा करती है।

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Nidhi
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