कब है मोक्षदा एकादशी, जानिए शुभ मुहूर्त, कथा और पूजन विधि

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हेल्लो दोस्तों मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष के महीने में शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है वहीं, अंग्रेजी या ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार मोक्षदा एकादशी नवंबर या दिसंबर के महीने में आती है। जैसा कि नाम से पता चलता है, कि मोक्ष माँगने के लिए यह दिन बहुत ही रमणीय है। पितरों के लिए मोक्ष के द्वार खोल देने वाली इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी ने नाम से जाना जाता है। Mokshada Ekadashi Vrat

द्वापर युग में उसी दिन, भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान दिया था। इसलिए, उस दिन को गीता जयंती के रूप में भी मनाया जाता है क्योंकि इस दिन गीता का प्रचार किया गया था, मानवता को धार्मिकता की ओर ले जाया जा सके। इस दिन भगवान कृष्ण के मुख से पवित्र भगवत गीता का जन्म हुआ था. मोक्षदा एकादशी का सार भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं अर्जुन से कहा था. इस पवित्र दिन की कहानी भगवान के मुख से ही उद्धृत हुई थी.

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मोक्षदा एकादशी शुभ मुहूर्त :

एकादशी तिथि शुरू : 24 दिसंबर 2020 को रात 11 बजकर 17 मिनट से
एकादशी तिथि ख़त्म : 25 दिसंबर 2020 रात 1 बजकर 54 मिनट तक

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक मोक्षदा एकादशी का व्रत बहुत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-पाठ और कीर्तन करने से पाप का नाश होता है। इसीलिए इस दिन पापों को नष्ट करने और पितरों के लिए मोक्ष के द्वार खोलने के लिए श्री हरि की तुलसी की मंजरी और धूप-दीप से पूजा की जाती है।

Mokshada Ekadashi Vrat
Mokshada Ekadashi Vrat

मोक्षदा एकादशी व्रत पूजा विधि :

  • मोक्षदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान कृष्ण की भी पूजा की जाती है।
  • सबसे पहले साधक को प्रात: उठकर स्नान करना चाहिए और साफ वस्त्र धारण करके एक चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
  • इसके बाद भगवान विष्णु को पीले वस्त्र, पीले फूल, माला, तुलसी, नैवेद्य और ऋतुफल अर्पित करने चाहिए और धूप व दीप जलाकर उनकी विधिवत पूजा करनी चाहिए।
  • पूजा के बाद मोक्षदा एकादशी की कथा अवश्य पढ़ें या सुनें। इस दिन गीता का पाठ भी किया जाता है। मोक्षदा एकादशी पर गीता अवश्य ही पढ़नी या सुननी चाहिए।
  • इसके बाद भगवान विष्णु की धूप व दीप से आरती उतारें और उन्हें मिठाईयों का भोग लगाएं।
  • अंत में भूल के लिए क्षमा याचना करें और उसके बाद बची हुई मिठाई को प्रसाद के रूप में घर के सभी लोगों के बीच में वितरित करें और स्वयं भी ग्रहण करें।
  • इस व्रत के पालन से पुरे कुटुंब को सुख की प्राप्ति होती हैं.

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मोक्षदा एकादशी व्रत कथा :

गोकुल नाम के नगर में वैखानस नामक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे। वह राजा अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करता था। एक बार रात्रि में राजा ने एक स्वप्न देखा कि उसके पिता नरक में हैं। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

प्रात: वह विद्वान ब्राह्मणों के पास गया और अपना स्वप्न सुनाया। कहा- मैंने अपने पिता को नरक में कष्ट उठाते देखा है। उन्होंने मुझसे कहा कि हे पुत्र मैं नरक में पड़ा हूँ। यहाँ से तुम मुझे मुक्त कराओ। जब से मैंने ये वचन सुने हैं तब से मैं बहुत बेचैन हूँ। चित्त में बड़ी अशांति हो रही है। मुझे इस राज्य, धन, पुत्र, स्त्री, हाथी, घोड़े आदि में कुछ भी सुख प्रतीत नहीं होता। क्या करूँ?

राजा ने कहा- हे ब्राह्मण देवताओं! इस दु:ख के कारण मेरा सारा शरीर जल रहा है। अब आप कृपा करके कोई तप, दान, व्रत आदि ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल जाए। उस पुत्र का जीवन व्यर्थ है जो अपने माता-पिता का उद्धार न कर सके।

Mokshada Ekadashi Vrat
Mokshada Ekadashi Vrat

एक उत्तम पुत्र जो अपने माता-पिता तथा पूर्वजों का उद्धार करता है, वह हजार मुर्ख पुत्रों से अच्छा है। जैसे एक चंद्रमा सारे जगत में प्रकाश कर देता है, परंतु हजारों तारे नहीं कर सकते। ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! यहाँ पास ही भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है। आपकी समस्या का हल वे जरूर करेंगे।

ऐसा सुनकर राजा मुनि के आश्रम पर गया। उस आश्रम में अनेक शांत चित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे। उसी जगह पर्वत मुनि बैठे थे। राजा ने मुनि को साष्टांग दंडवत किया। मुनि ने राजा से सांगोपांग कुशल पूछी। राजा ने कहा कि महाराज आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल हैं, लेकिन अकस्मात मेरे मन में अत्यंत अशांति होने लगी है।

ऐसा सुनकर पर्वत मुनि ने आँखें बंद की और भूत विचारने लगे। फिर बोले हे राजन! मैंने योग के बल से तुम्हारे पिता के कुकर्मों को जान लिया है। उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान माँगने पर भी नहीं दिया। उसी पापकर्म के कारण तुम्हारे पिता को नर्क में जाना पड़ा।

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तब राजा ने कहा ‍इसका कोई उपाय बताइए। मुनि बोले: हे राजन! आप मार्गशीर्ष एकादशी का उपवास करें और उस उपवास के पुण्य को अपने पिता को संकल्प कर दें। इसके प्रभाव से आपके पिता की अवश्य नर्क से मुक्ति होगी। मुनि के ये वचन सुनकर राजा महल में आया और मुनि के कहने अनुसार कुटुम्ब सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत किया। इसके उपवास का पुण्य उसने पिता को अर्पण कर दिया। इसके प्रभाव से उसके पिता को मुक्ति मिल गई और स्वर्ग में जाते हुए वे पुत्र से कहने लगे- हे पुत्र तेरा कल्याण हो। यह कहकर स्वर्ग चले गए।

मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का जो व्रत करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत से बढ़कर मोक्ष देने वाला और कोई व्रत नहीं है। इस दिन गीता जयंती मनाई जाती हैं साथ ही यह धनुर्मास की एकादशी कहलाती हैं, अतः इस एकादशी महत्व कई गुना और भी बढ़ जाता हैं। इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करें तथा प्रतिदिन थोडी देर गीता अवश्य पढें।

Mokshada Ekadashi Vrat
Mokshada Ekadashi Vrat

मोक्षदा एकादशी का महत्व :

मोक्षदा एकादशी का महत्व सनातन धर्म शास्त्रों में अत्याधिक बताया गया है। कहा जाता है कि मोक्षदा एकादशी का व्रत रखने से मनुष्य के सभी पापों का अंत होता है और उसे मरने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्षदायिनी होने के कारण ही इस एकादशी का नाम मोक्षदा एकादशी है।

इस दिन भगवान विष्णु की तुलसी की मंजरी के साथ- साथ धूप व दीप से पूजा होती है। जो भी व्यक्ति इस तरह से भगवान विष्णु की पूजा करता है उसे जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है।

इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति को गंगा स्नान के समान ही फल की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं इस व्रत को रखने से पूर्वजों को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है और उनके लिए स्वर्ग के द्वार भी खुल जाते हैं। मोक्षदा एकादशी के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया था। इसी कारण से मोक्षदा एकादशी को गीता एकादशी के नाम से भी जाना जाता है और इस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है।

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गीता जयंती होने से और भी खास होती है यह एकादशी :

मोक्षदा एकादशी के दिन ही गीता जयंती भी है। इसी दिन गीता का उद्भव हुआ था। महाभारत के समय युद्ध भूमि में जब अर्जुन अपने सगे-संबंधियों को देखकर विचलित हो गए और शस्त्र उठाने से मना कर दिया, तब भगवान कृष्ण ने उनके ज्ञानचक्षु खोलने के लिए उन्हें उपदेश दिए थे। जो महाभारत ग्रंथ में गीता के नाम से उल्लेखित हैं। 

भगवान श्री कृष्ण ने इस एकादशी का महत्व धर्मराज युधिष्ठिर को समझाते हुए कहा था कि ये एकादशी इतनी पुण्यदायिनी है कि इसका व्रत करने से मनुष्य सभी पापकर्मों के बंधन से छूट जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष ही ईश्वर से मिलने का एकमात्र जरिया है। 

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