15 अगस्त को है अजा एकादशी व्रत और क्यों रखा जाता है इस दिन व्रत

0
87

हेल्लो दोस्तों इस बार अजा एकादशी (Aja Ekadashi Vrat Katha) 15 अगस्त को पड़ने वाली है भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी अजा या कामिका एकादशी के नाम से जानी जाती है. इस दिन की एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु जी की पूजा का विधान होता है. इस दिन रात्रि जागरण तथा व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप दूर होते है.

हिन्दू चंद्र कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक माह में पंद्रह दिनों के अंतराल पर दो पक्ष आते हैं, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। दोनों पक्षों में एक अमवस्या तिथि और एक पूर्णिमा तिथि आती है और इस दौरान दो एकादशी की तिथि आती है। हर महीने आने वाली एकादशी तिथि का अलग-अलग महत्व होता है। एक साल में करीबन 24 एकादशी व्रत आते हैं, इन्हीं एकादशी तिथि में से एक अजा एकादशी है जिसे काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।

ये भी पढ़िए : जया एकादशी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्‍व

अजा एकादशी पर ध्यान रखें ये बातें :

  • अजा एकादशी तिथि के व्रत के दिन व्यक्ति को शीघ्र उठना चाहिए. उठने के बाद नित्यक्रिया से मुक्त होने के बाद, सारे घर की सफाई करनी चाहिए और इसके बाद तिल और मिट्टी के लेप का प्रयोग करते हुए, कुशा से स्नान करना चाहिए. स्नान आदि कार्य करने के बाद, भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए.
  • दशमी तिथि की रात्रि में मसूर की दाल खाने से बचना चाहिए. इससे व्रत के शुभ फलों में कमी होती है. चने नहीं खाने चाहिए, करोदों का भोजन नहीं करना चाहिए, शाक आदि भोजन करने से भी व्रत के फलों में कमी होती है, इस दिन शहद का सेवन करने से एकादशी व्रत के फल कम होते है. व्रत के दिन और दशमी तिथि के दिन पूर्ण ब्रह्माचार्य का पालन करना चाहिए.
  • भगवान श्री विष्णु जी का पूजन करने के लिये एक शुद्ध स्थान पर धान्य रखने चाहिए. धान्यों के ऊपर कुम्भ स्थापित किया जाता है. कुम्भ को लाल रंग के वस्त्र से सजाया जाता है. और स्थापना करने के बाद कुम्भ की पूजा की जाती है. फिर कुम्भ के ऊपर श्री विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित कि जाती है प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्प लिया जाता है. संकल्प लेने के पश्चात धूप, दीप और पुष्प से भगवान श्री विष्णु जी की जाती है.
Aja Ekadashi Vrat Katha
Aja Ekadashi Vrat Katha

कैसे करें पूजा – Aja Ekadashi Pooja Vidhi

अजा एकादशी के दिन खास तरह से की जाती है। इस दिन सुबह स्नान कर पवित्र मन से पूर्व दिशा में गौमूत्र झिड़क दें। उसके बाद उस जगह पर गेहूं रख दें। गेहूं के ऊपर तांबे के लोटे में जल भरकर कलश रखें। कलश के ऊपर अशोक का पत्ता या पान रखें। अब कलश के ऊपरी भाग में नारियल रख दें।

भगवान विष्णु की मूर्ति को कलश के समीप रखें और दीपक जलाएं। विष्णु भगवान को फल, धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाएं। साथ ही फल रूप में प्रसाद चढ़ाएं। पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करें। दीपक एकादशी के दिन जलता रहने दें उसे द्वादशी के दिन ही हटाएं। कलश को हटाने के बाद पानी को घर में छिड़क दें और बचे हुए पानी को तुलसी के पौधे में डाल दें।

ये भी पढ़िए : भगवान शिव के उपवास में भूलकर भी न करें इन व्यंजनों का सेवन

व्रत रखने के नियम – Aja Ekadashi Vrat Niyam

अजा एकादशी के व्रत में सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करें, उसके सूर्य देवता को जल अर्पित करें। ध्यान रखें जल हमेशा तांबे के लोटे से चढ़ाएं उसके बाद सूर्य भगवान को लाल फूल अर्पित करें। व्रत के दिन किसी मंदिर में जाएं और ध्वज दान करें। शिवलिंग की पूजा करें उस पर तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं और काला तिल अर्पित करें।

सूर्यास्त के बाद घर के मंदिर में या तुलसी जी के पास दीया जलाएं। साथ ही हनुमान जी के पास बैठकर सीताराम-सीताराम का जाप करें। अजा एकादशी के दिन विष्णु जी और लक्ष्मी जी की पूजा। पूजा से पहले गणेश जी का ध्यान धारण करें। अजा एकादशी का व्रत पवित्र मन से करें। इस दिन केवल फलाहार करें। किसी तरह का कोई अन्न नहीं खाएं। दिन फल भी केवल एक ही बार खाएं।

Aja Ekadashi Vrat Katha
Aja Ekadashi Vrat Katha

अजा एकादशी कथा – Aja Ekadashi Vrat Katha

भगवान श्री राम के वंश में हरिश्चन्द्र नाम के एक राजा हुए थे। राजा अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए प्रसिद्घ थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्ववामित्र को उन्होंने अपना राजपाट दान कर दिया है। सुबह विश्वामित्र वास्तव में उनके द्वार पर आकर कहने लगे तुमने स्वप्न में मुझे अपना राज्य दान कर दिया।

राजा ने सत्यनिष्ठ व्रत का पालन करते हुए संपूर्ण राज्य विश्वामित्र को सौंप दिया। दान के लिए दक्षिणा चुकाने हेतु राजा हरिश्चन्द्र को पूर्व जन्म के कर्म फल के कारण पत्नी, बेटा एवं खुद को बेचना पड़ा। हरिश्चन्द्र को एक डोम ने खरीद लिया जो श्मशान भूमि में लोगों के दाह संस्कारा का काम करवाता था।

डोम ने राजा हरिश्चन्द्र को श्मशान भूमि में दाह संस्कार के लिए कर वसूली का काम दे दिया। इसके बावजूद सत्यनिष्ठा से राजा विचलित नहीं हुए। एक दिन भाग्यवश गौतम मुनि से इनकी भेंट हुई। गौतम मुनि ने राजा से कहा कि हे राजन पूर्व जन्म के कर्मों के कारण आपको यह कष्टमय दिन देखना पड़ रहा है।

ये भी पढ़िए : आखिर निर्जला एकादशी को क्यों कहते हैं भीमसेन एकादशी, जानें वजह

आप भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी जिसका नाम अजा एकादशी है उस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करें और रात्रि में जागरण करते हुए भगवान का ध्यान कीजिए आपको कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी। राजा ने ऋषि के बताए नियम के अनुसार अजा एकादशी का व्रत किया।

इसी दिन इनके पुत्र को एक सांप ने काट लिया और मरे हुए पुत्र को लेकर इनकी पत्नी श्मशान में दाह संस्कार के लिए आई। राजा हरिश्चन्द्र ने सत्यधर्म का पालन करते हुए पत्नी से भी पुत्र के दाह संस्कार हेतु कर मांगा। इनकी पत्नी के पास कर चुकाने के लिए धन नहीं था इसलिए उसने अपनी सारी का आधा हिस्सा फाड़कर राजा का दे दिया।

राजा ने जैसे ही सारी का टुकड़ा अपने हाथ में लिया आसमान से फूलों की वर्षा होने लगी। देवगण राजा हरिश्चन्द्र की जयजयकार करने लगे। इन्द्र ने कहा कि हे राजन् आप सत्यनिष्ठ व्रत की परीक्षा में सफल हुए। आप अपना राज्य स्वीकार कीजिए।

अजा एकादशी व्रत का महत्व – Aja Ekadashi Mahatva

समस्त उपवासों में अजा एकादशी के व्रत श्रेष्ठतम कहे गए हैं. एकादशी व्रत को रखने वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. अजा एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा है.

इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन है. इस उपवास के विषय में यह मान्यता है कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते है. यह उपवास, मन निर्मल करता है, ह्रदय शुद्ध करता है तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here