18 दिसंबर को है विनायक चतुर्थी व्रत, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व

0
73

हेल्लो दोस्तों हिंदू धर्म में भगवान गणेश का विशेष महत्व है। सभी देवताओं से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। किसी भी शुभ कार्य का आरंभ भगवान गणेश की आराधना के बिना नहीं होता। जब भी कोई संकट आए तो भगवान गणेश याद आते हैं। मान्यता है कि भगवान गणेश को प्रसन्न कर आप अपनी कोई भी इच्छा पूर्ण कर कर सकते हैं। इसलिए प्रत्येक माह भगवान गणेश का व्रत और पूजन किया जाता है। विनायक चतुर्थी भी एक ऐसा ही व्रत है जो प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है। Vinayaka Chaturthi Vrat

ये भी पढ़िए : भाद्रपद की संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत, जानिए कथा और पूजन की विधि

विनायक चतुर्थी क्या है? :

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक चंद्र मास में दो चतुर्थी पड़ती हैं। एक शुक्ल पक्ष में अमावस्या या उसके बाद की चतुर्थी और दूसरी कृष्ण पक्ष में पूर्णिमा या उसके बाद की चतुर्थी। हिंदू धर्मग्रंथों में चतुर्थी को भगवान गणेश का दिन माना गया है। इसलिए प्रत्येक मास की चतुर्थी को भगवान गणेश का व्रत किया जाता है। अमावस्या या उसके बाद की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी का व्रत किया जाता है जबकि कृष्ण पक्ष में पूर्णिमा या उसके बाद की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। वैसे तो विनायक चतुर्थी का व्रत प्रत्येक माह किया जाता है लेकिन भाद्रपद में पड़ने वाली विनायक चतुर्थी का विशेष महत्व है जिसे गणेश चतुर्थी भी कहा जाता है। पूरे विश्व में इसे भगवान गणेश के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है।

Vinayaka Chaturthi Vrat
Vinayaka Chaturthi Vrat

शुभ मुहूर्त :

विनायक चतुर्थी के दिन दोपहर में गणेश जी की पूजा करने का विशेष महत्व है। श्रद्धातु इसके लिए सबसे पहले प्रात: जल्दी उठकर स्नान कर लें और पूरे दिन व्रत करने का संकल्प लें। इस दिन लाल वस्त्र धारण करना शुभ होता है इसलिए पूजा में श्रद्धालु लाल रंग के कपड़े पहनें। शुभ मुहूर्त में पूजा करें। इस माह की चतुर्थी 18 दिसंबर 2020 दिन शुक्रवार को है जिसका शुभ मुहूर्त सुबह 11:03 बजे से दोपहर 1:09 बजे तक है।

पूजा विधि :

  • पूजा के लिए सबसे पहले स्नान करने के बाद एक चौकी बनाकर उसे लाल वस्त्र से ढक दें और उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
  • पूजन आरंभ करते हुए साधक गणेश मंत्र का उच्चारण कर गणेश जी का आहवाहन कर लें।
  • अब भगवान गणेश को पुष्प, दूब, चंदन, दही, मिष्ठान, फल तथा पान का पत्ता अर्पित कर उनकी आरती करें।
  • भगवान गणेश को लड्डू बहुत पसंद हैं इसलिए भगवान गणेश को बेसन या बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं।
  • इस दिन गणेश जी को 21 लड्डू चढ़ाएं जिनमें से 5 लड्डू किसी ब्राह्मण को दान कर दें और 5 लड्डू भगवान गणेश के चरणों में रख दें। बाक़ी के बचे लड्डू प्रसाद में बांट दें।
  • भगवान गणेश की कथा सुनें और ऊँ गणपताय नम: मंत्र का जाप करें।
  • इस दिन ब्राह्मणों और ज़रूररतमंदों को दान करना चाहिए इसलिए जितना संभव हो सके उतने लोगों को भोजन कराएं और ज़रूरी सामान दान करें। कम से एक व्यक्ति को तो इस दिन ज़रूर भोजन कराएं।
  • पूरे दिन व्रत रखकर शाम को गणेश जी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं और गणेश स्तुति, गणेश सहस्रनामावली, गणेश पुराण आदि गणेश जी के ग्रंथों का पाठ करें। उसके बाद सात्विक भोजन करके व्रत खोलें।

ये भी पढ़िए : जानिये आखिर क्यों किया जाता है गणेश विसर्जन ?

विनायक चतुर्थी व्रत कथा :

पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती के मन में ख्याल आता है कि उनका कोई पुत्र नहीं है। तब वे अपने मैल से एक बालक की प्रतिमा बनाती हैं और उसमें जान डाल देती हैं। उसके बाद वे कंदरा में स्थित कुंड में स्नान करने के लिए चली जाती हैं। लेकिन जाने से पहले वे बालक को आदेश देती हैं कि कंदरा में किसी को प्रवेश मत करने देना। बालक माता पार्वती के आदेश का पालन करते हुए वहां पहरा देने लगता है। कुछ देर बाद तभी भगवान शिव वहां प्रवेश करते हैं। वे माता पार्वती से मिलने के लिए कंदरा में प्रवेश करने ही जा रहे होते हैं कि बालक उन्हें रोक देता है। इस पर भगवान शिव को क्रोध आ जाता है और वे अपने त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर देते हैं।

माता पार्वती स्नान कर जब कंदरा से लौटती हैं तो अपने पुत्र की यह दशा देखकर बेहद क्रोधित हो जाती हैं। भगवान शिव समेत सभी देवगण माता पार्वती के क्रोध को देखकर भयभीत हो जाते हैं। भगवान शिव देवगण को आदेश देते हैं कि ऐसे बालक का सिर लेकर आओ जिसकी माता की पीठ बच्चे की ओर हो। बहुत खोजने के बाद देवगण एक गज (हाथी) के बच्चे का शीश लेकर आते हैं।

Vinayaka Chaturthi Vrat
Vinayaka Chaturthi Vrat

इसलिए प्रथम पूज्य हैं गणेश :

भगवान शिव गणेश जी के यह शीश लगाकर उन्हें जीवित कर देते हैं। लेकिन माता पार्वती कहती हैं कि गज का शीश होने के कारण सभी उनके बालक का उपहास करेंगे। तब भगवान शिव गणेश जी को वरदान देते हैं कि आज से सभी उनके बालक को गणपति के नाम से जानेंगे। तब सभी देवगण भी उन्हें वरदान देते हैं कि कोई भी मांगलिक कार्य शुरु करने से पहले भगवान गणेश की पूजा करना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर उसे मनचाहे फल की प्राप्ति नहीं होगी। इस कथा के अनुसार भगवान गणेश का विधि पूर्वक व्रत एवं पूजन करने से आपके सभी कार्य सफल होते हैं और आपकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।

दूसरी कहानी –

एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। उस समय दोनों चौपड़ खेल रहे थे। हालांकि तब उनके दिमाग में यह ख्याल आया कि खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा? तब भगवान शिव ने कुछ दाने और फूल-पत्ती को इकट्ठा किया, उनसे एक पुतला बनाया, उसकी प्राण प्रतिष्ठा की और पुतले से कहा, बेटा हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, और हमारी हार-जीत का फैसला तुम करोगे।

ये भी पढ़िए : वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत, जानें पूजा विधि और पारंपरिक कथा !

इसके बाद माता पार्वती और भगवान शिव चौपड़ खेलना शुरू कर देते हैं। यह खेल तीन बार खेला गया और तीनों बार माता पार्वती ही जीती थी। हालांकि जब खेल समाप्ति के बाद बालक से हार-जीत का फैसला लेने को कहा गया तो उस बालक ने महादेव को विजयी बताया।

पार्वती ने दिया श्राप –

यह सुनकर माता पार्वती को बेहद क्रोध हुआ और उन्होंने बालक को लंगड़ा होने और कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। तब बालक ने माता से माफी मांगी और कहा कि, मुझसे ऐसी भूल हो गई है कृपया मुझे ऐसा श्राप ना दें। बालक को क्षमा मांगता देख माता का दिल पसीज गया और उन्होंने बालक से कहा, ‘यहाँ कुछ समय में गणेश पूजन के लिए कुछ नागकन्या आएंगी। उनके कहे अनुसार तुम भी गणेश का व्रत करना। ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त कर लोगे।’ ऐसा कहकर भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर चले गए।

Vinayaka Chaturthi Vrat

एक वर्ष के बाद उस स्थान पर नागकन्या गणेश भगवान का व्रत करने आईं। तब बालक ने उनसे व्रत की विधि पूछ कर 21 दिनों तक लगातार व्रत किया। बालक की पूजा से प्रसन्न होकर भगवान गणेश वहां प्रकट हुए और उन्होंने बालक से मनोवांछित फल मांगने को कहा। तब बालक ने भगवान से कहा, ‘हे प्रभु मुझे इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने माता-पिता के पास जा सकूं।’ तब भगवान तथास्तु कहकर वहां से अंतर्ध्यान हो गए। बालक इसके बाद कैलाश पर्वत पर पहुंचा जहाँ उसने सारी बात भगवान शिव को बताई।

भगवान शंकर ने माता पार्वती को ये बात बताई जिसे सुनकर माता पार्वती के मन में अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागृत हुई। इसके बाद माता पार्वती ने भी 21 दिन तक भगवान गणेश का व्रत किया और 21 दिनों में व्रत के प्रभाव से स्वयं भगवान कार्तिकेय माता पार्वती से मिलने आ गए। तभी से गणेश चतुर्थी का यह व्रत इंसान की समस्त मनोकामना की पूर्ति करने वाला व्रत माना गया।

ये भी पढ़िए : क्या आप करवा चौथ व्रत का उद्यापन करना चाहती हैं? जानिए इसकी विधि

विनायक चतुर्थी का महत्व :

विनायक चतुर्थी को ‘वरद’ विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। ‘वरद’ यानी ‘ईश्वर से किसी चीज़ की कामना करना’। मान्यता है कि इस दिन विधि पूर्वक व्रत करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और व्रती को भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भगवान गणेश उसे सद्बुद्धि, विवेक और धैर्य प्रदान करते हैं। ये वे गुण हैं जिनसे कोई व्यक्ति अपने जीवन में प्रगति करता है और अपनी कोई भी इच्छा पूरी कर सकता है।

पौराणिक ग्रंथों में इस व्रत के महत्व की चर्चा विस्तार से की गई है। नरसिंह पुराण और भविष्य पुराण में इस व्रत का उल्लेख किया गया है। भगवान कृष्ण भी युधिष्ठिर को इस व्रत के महत्व के बारे में बताते हैं। इस व्रत को करने से व्रती को भौतिक सुख के साथ-साथ आंतरिक सुख भी मिलता है। उसके जीवन के सभी कष्ट व बाधाएं दूर होती हैं और उसकी प्रगति के मार्ग खुलते हैं। इससे ज्ञान, धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने से बुध ग्रह के दुष्प्रभावों में भी कमी आती है।

Ganesh Chaturthi 2020

विनायक चतुर्थी व्रत उद्यापन विधि :

  • विनायक चतुर्थी के दिन सुबह प्रात: काल जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें।
  • इसके बाद एक चौकी पर गणेश की जी की स्थापना करें और साथ ही कलश की भी स्थापना करें ।
  • कलश को स्थापित करने के बाद सफेद तिल और गुड़ का तिलकूट बनाएं।
  • इसके बाद उस कलश पर स्वास्तिक बनाएं और उसके ऊपर तिलकूट में एक सिक्का रखकर स्थापित करें।
  • इसके बाद उस कलश पर रोली से 13 बिंदी लगाएं और भगवान गणेश की विधिवत पूजा करें।
  • उन्हें दूर्वा चढ़ाएं, रोली से उनका तिलक करें, उन्हें फल और फूल आदि भी अर्पित करें।
  • इसके बाद विनायक चतुर्थी की कथा पढ़ें या सुनें और भगवान गणेश की धूप व दीप से आरती करें।
  • भगवान गणेश की आरती करने के बाद आप उन्हें मोदक और लड्डूओं का भोग लगाएं।
  • इसके बाद पूरा दिन व्रत रखें और शाम के समय अपने व्रत का पारण करें।
  • अपने व्रत का पारण तिलकूट से ही करें और कलश पर स्थापित तिलकूट को किसी पंडित को पैसों सहित दान में दे दें।
  • इसके बाद रात्रि जागरण अवश्य करें। क्योंकि ऐसा करने से आपको अपने सभी व्रतों का पूर्णफल प्राप्त होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here