Varaha Jayanti Katha
Varaha Jayanti Katha
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हेल्लो दोस्तों वराह भगवान को भगवान विष्णु का ही एक अवतार माना गया है. भगवान विष्णु (Bhagwan Vishnu) के दस अवतारों में यह उनका तीसरा अवतार है, जिनकी जयंती भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन मनाई जाती हैं. इस साल यह पावन तिथि 09 सितंबर 2021 को पड़ने जा रही है. वराह जयंती (Varaha Jayanti Katha 2021) का पर्व भगवान भगवान विष्णु के इस अवतार का जन्म उत्सव मनाने के लिए होता है.

भगवान विष्णु के इस स्वरूप को उद्धारक देवता के रूप में जाना जाता है. वराह जयंती (kab hai varah jayanti) के दिन भगवान विष्णु के आधे सुअर और आधे मनुष्य रूपी अवतार की पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. वराह जयंती का पावन पर्व दक्षिण भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है.

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वराह जयंती पूजा विधि (Varaha Jayanti Puja Vidhi) :

इस दिन साधक को स्नान आदि करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। फिर एक कलश (kalash) में भगवान वराह की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।

इसके बाद उस कलश पर फल, फूल आदि अर्पित करके माला पहनानी चाहिए।

अब कलश की विधिवत पूजा करनी चाहिए और वराह जयंती की कथा सुननी या पढ़नी चाहिए।

इसके बाद भगवान वराह की आरती करनी चाहिए और वराह जयंती के अगले दिन इस कलश का विसर्जन (visarjan) कर देना चाहिए।

कलश के विसर्जन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा आदि देनी चाहिए।

इस दिन भगवान वराह के मंत्र का जप मूंगे अथवा लाल चंदन की माला से जपने का विधान है. इससे भगवान वराह का शीघ्र ही आशीर्वाद प्राप्त होता है

भगवान वराह का मंत्रनमो भगवते वाराहरूपाय भूभुर्व: स्व: स्यात्पते भूपतित्वं देह्येतद्दापय स्वाहा।। मंत्र को जपते हुए शहद, शक्कर या गुड़ से 108 बार हवन करने से शीघ्र ही सभी मनोकामना पूरी होती है.

Varaha Jayanti Katha 2021

वराह जयंती से जुड़ी कथा (Varaha Jayanti Katha) :

पौराणिक कथा के मुताबिक कश्यप पत्नी और दैत्य माता दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष (hiranyaksha) और हिरण्यकशिपु (hiranyakashipu) का जन्म हुआ। इनका जन्म सौ सालों के गर्भ के बाद हुआ था। ऐसे में जन्म लेते ही इनका रूप बड़ गया। ये विशालकाय हो गए। जैसे ही इनका जन्म हुआ सभी लोकों में अंधेरा छाने लगा। इसी दौरान हिरण्यकशिपु में अमर और अजेय होने की इच्छा हुई उसने ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तप किया।

ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि वो देव, दानव, मानव किसी से भी पराजित नहीं होगा और मारा भी नहीं जाएग। इस वरदान के बाद से ही हिरण्यकशिपु के अत्याचार बढ़ गए। कुछ ही समय में उसने सभी लोगों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इन सब में हिरण्याक्ष भी उसकी मदद कर रहा था। आज्ञा का पालन करते हुए शत्रुओं का नाश करने लगा।

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ऐसे हुआ हिरण्याक्ष का अंत :

जब हिरण्याक्ष ने वरूण देव को युद्ध के लिए ललकारा, मगर उन्होंने बहुत ही विनम्रता से उत्तर दिया कि उनमें इतनी शक्ति और साहस नहीं कि वो उनसे युद्ध कर सके। ​केवल विष्णु ही हैं जो तुम्हें युद्ध में पराजित कर सकते हैं यह सुनकर वो विष्णु की खोज में निकल पड़ा। उसे नारदमुनि से सूचना मिली की विष्णु ने वराह का अवतार लिया हैं वो रसातल से पृथ्वी को समुद्र से ऊपर ला रहे हैं उनकी खोज में वो समुद्र के नीचे रसातल पहुंच गया।

वहां का दृश्य देख अचंभित हो गया। उसने देखा कि वराह ने अपने दांतों में धरती दबा रखी है और उसे उठाए चले जा रहे हैं विष्णु को युद्ध करने के लिए उसने ललकारा। मगर वह क्रोधित नहीं हुए और शांत चित के साथ आगे बढ़ते गए। उसने बहुत प्रयास किया कि वो विष्णु को उकसा पाए मगर ऐसा नहीं हो पाया।

श्री विष्णु के तीसरे अवतार वराह ने अपना काम पूरा कर दिया। पृथ्वी को स्थापित करने के बाद उन्होंने हिरण्याक्ष से कहा कि क्या वो केवल बातें ही करता है या फिर लड़ने का साहस भी हैं उन्होंने कहा, मैं तुम्हारे सामने हूं, तुम मुझ पर प्रहार क्यों नहीं करते। इतना कहते ही वो बिना सोच विचार किए युद्ध के लिए आगे बढ़ गया।

Varaha Jayanti Katha 2021
Varaha Jayanti Katha 2021

क्रोधित हिरण्याक्ष अपने त्रिशूल से विष्णु पर आक्रमण करने लगा। देखते ही देखते वराह ने अपने सुदर्शन चक्र से उसके त्रिशूल के टुकड़े कर दिए। अपने ह​थियारों को टूटता देख वो मायावी रूप लेने लगा। वराह को भ्रमित करने की भी कोशिश की। हिरण्याक्ष लगातार विफल हो रहा था और ​श्री विष्णु ने उसका संहार किया। उनके हाथों मोक्ष पाकर हरिण्याक्ष सीधा बैंकुठ लोक गमन कर गया।

प्रसिद्ध मंदिर जहां वराह जयंती मनाई जाती है :

यह त्यौहार भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुत खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है लेकिन वहां कुछ जगहें और मंदिर हैं जहां त्योहार (tyohaar) को बहुत ख़ुशी से और इसे बहुत महत्व के साथ मनाया जाता है। मथुरा (mathura) में, भगवान वराह का एक बहुत पुराना मंदिर है जहां उत्सव एक भव्य स्तर पर होता है। वराह जयंती के उत्सव के लिए मशहूर एक और मंदिर तिरुमाला में स्थित भु वराह स्वामी मंदिर है। इस त्यौहार की पूर्व संध्या पर, देवता की मूर्ति को नारियल के पानी, दूध, शहद, मक्खन और घी के साथ नहला कर पूजा की जाती है।

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वराह जयंती का महत्व (Varaha Jayanti Mahatv) :

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वराह जंयती मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वीं को बचाने के लिए वराह अवतार लिया था। इस दिन भगवान विष्णु के भक्त भजन-कीर्तन व उपवास एवं व्रत आदि करते हैं। माना जाता है जो भी व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह भूत प्रेत जैसी बाधाएं उसे कभी भी परेशान नहीं करती। वराह जंयती पर मंदिरो में कई अनुष्ठान किए जाते हैं। भगवान विष्णु के इस अवतार में उनका धड़ मानव का और सिर सूअर का है। जो बुराईयों पर जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति के पास धन और संपदा की कोई भी कमीं नही रहती। भगवान विष्णु के इस अवतार को बहुत ही कल्याणकारी माना जाता है। माना जाता है जो लोग भी वराह जयंती का व्रत रखते हैं उनका सोया हुआ भाग्य जाग जाता है।

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