कब है पौष माह में स्कंद षष्ठी व्रत, जानिए साल 2021 में व्रत की तिथियां

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हेल्लो दोस्तों स्कंद षष्ठी व्रत 18 जनवरी को पड़ रहा है। यह व्रत भगवान कार्तिकेय के लिए रखा जाता है। स्कंद षष्ठी का व्रत कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है। तिथि तत्त्व ने चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को स्कंद षष्ठी कहा है। यह व्रत संतान षष्ठी नाम से भी जाना जाता है। कुछ लोग आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कंद षष्ठी मानते हैं दक्षिण भारत के राज्यों में स्कंद षष्ठी व्रत बेहद लोकप्रिय है। भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र हैं। Skanda Shashti Vrat

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पूजन सामग्री :

भगवान शालिग्राम जी का विग्रह, कार्तिकेय का चित्र, तुलसी का पौधा (गमले में लगा हुआ), तांबे का लोटा, नारियल, पूजा की सामग्री, जैसे-कुंकुम, अक्षत, हल्दी, चंदन अबीर, गुलाल, दीपक, घी, इत्र, पुष्प, दूध, जल, मौसमी फल, मेवा, मौली आसन इत्यादि। यह व्रत विधिपूर्वक करने से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है। संतान को किसी प्रकार का कष्ट या रोग हो तो यह व्रत संतान को इन सबसे बचाता है।

स्कंद षष्ठी व्रत विधि :

  • सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें। 
  • इसके बाद स्नान-ध्यान कर सर्वप्रथम व्रत का संकल्प लें। 
  • पूजा घर में मां गौरी और शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित करें। 
  • पूजा जल, मौसमी फल, फूल, मेवा, कलावा, दीपक, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूध, गाय का घी, इत्र आदि से करें। 
  • अंत में आरती करें। 
  • वहीं शाम को कीर्तन-भजन पूजा के बाद आरती करें। 
  • इसके पश्चात फलाहार करें।
Skanda Shashti Vrat
Skanda Shashti Vrat

स्कंद षष्ठी तिथि 2021 :

  • जनवरी स्कन्द षष्ठी – 18, 2021, सोमवार
  • फरवरी स्कन्द षष्ठी – 17, 2021, बुधवार
  • मार्च स्कन्द षष्ठी – 19, 2021, शुक्रवार
  • अप्रैल स्कन्द षष्ठी – 18, 2021, रविवार
  • मई स्कन्द षष्ठी – 17, 2021, सोमवार
  • जून स्कन्द षष्ठी – 16, 2021, बुधवार
  • जुलाई स्कन्द षष्ठी – 15, 2021, बृहस्पतिवार
  • अगस्त स्कन्द षष्ठी – 13, 2021, शुक्रवार
  • सितम्बर स्कन्द षष्ठी – 12, 2021, रविवार
  • अक्टूबर स्कन्द षष्ठी – 11, 2021, सोमवार
  • नवम्बर स्कन्द षष्ठी – 09, 2021, मंगलवार
  • दिसम्बर स्कन्द षष्ठी – 09, 2021, बृहस्पतिवार

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स्कंद षष्ठी का धार्मिक महत्व :

धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। इनकी पूजा से जीवन में हर तरह की कठिनाइंया दूर होती हैं और व्रत रखने वालों को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान के कष्टों को कम करने और उसके सुख की कामना से ये व्रत किया जाता है। हालांकि यह त्योहार दक्षिण भारत में प्रमुख रूप से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है। उनका प्रिय पुष्प चंपा है। इसलिए इस व्रत को चंपा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया था।

भगवान स्कंद शक्ति के अधिदेव हैं, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापतित्व प्रदान किया था। मयूर पर आसीन देवसेनापति कुमार कार्तिकेय की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा होती है, यहां पर यह मुरुगन नाम से विख्यात हैं। प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ इनकी कृपा से संपन्न होते हैं। स्कंदपुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराण सभी पुराणों में सबसे विशाल है। स्कंद भगवान हिंदू धर्म के प्रमुख देवों में से एक हैं। स्कंद को कार्तिकेय और मुरुगन नामों से भी पुकारा जाता है। दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक भगवान कार्तिकेय शिव-पार्वती के पुत्र हैं। कार्तिकेय भगवान के अधिकतर भक्त तमिल हिंदू हैं। इनकी पूजा मुख्यतः भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडू में होती है। भगवान स्कंद के सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं।

Skand Shashti Vrat
Skanda Shashti Vrat

ऐसे हुआ था भगवान कार्तिकेय का जन्म :

कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे। 

इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे। 

उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।

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