पौष माह की पूर्णिमा को आती है शाकम्भरी जयंती, जानें तिथि, पूजा विधि और पौराणिक कथा

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हेल्लो दोस्तों हिंदू पंचांग के अनुसार, पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शाकम्भरी नवरात्र शुरू हो जाते हैं, जो पौष पूर्णिमा को समाप्त होते हैं. इसे शाकम्भरी जयंती (Shakambhari Jayanti Poojan) भी कहा जाता है. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, पौष मास की पूर्णिमा तिथि को मां दुर्गा ने मानव कल्याण के लिए मां शाकम्भरी का अवतार लिया था. इसे आदि शक्ति का सौम्य रूप भी कहा जाता है.

यही कारण है कि शाकम्भरी नवरात्रि आठ दिनों तक चलती है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में तिथियों के ऊपर नीचे होने के चलते शाकम्भरी नवरात्रि कभी 7 दिनों तक चली तो कभी नौ दिनों तक। आइए जानते हैं शाकम्भरी जयंती कब है और मां दुर्गा के इस स्वरूप को इस दिन कैसे प्रसन्न किया जा सकता है.

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शाकाम्भरी जयंती इस बार 28 जनवरी को है. ऐसा कहा जाता है कि मां दुर्गा ने पृथ्वी पर अकाल और गंभीर खाद्य संकट से निजात दिलाने के लिए शाकम्भरी का अवतार लिया था. इसलिए इन्हें सब्जियों और फलों की देवी के रूप में भी पूजा जाता है. इस दिन असहायों को अन्न, शाक (कच्ची सब्जी), फल व जल का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं.

इस पर्व के दौरान तंत्र-मंत्र के साधक अपनी सिद्धि के लिए वनस्पति की देवी मां शाकंभरी की आराधना करते हैं. हिंदू धर्म में शाकम्भरी नवरात्रि का भी बहुत महत्व है. अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष यानी 2021 में शाकम्भरी नवरात्रि 21 जनवरी से 28 जनवरी तक मनाया जायेगा.

Shakambhari Jayanti Poojan
Shakambhari Jayanti Poojan

कौन हैं माता शाकम्भरी :

दुर्गा के सभी अवतारों में से रक्तदंतिका, भीमा, भ्रामरी, शाकंभरी का देवी पुराण में विस्तार से वर्णन किया गया है. इन्हीं में एक हैं माँ शाकम्भरी. बहुत-सी जगहों पर इन्हें ‘हरियाली का प्रतीक’ भी कहा जाता है. इसीलिए पुराणों में सभी शाकाहारी खाद्य उत्पादों को माता शाकम्भरी के प्रसाद के रूप में उल्लेख किया गया है. माता शाकम्भरी को मां दुर्गा का अत्यंत विनम्र एवं दयालू अवतार माना जाता है

शाकम्भरी माता देवी भगवती का अवतार हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी भगवती ने पृथ्वी पर अकाल और गंभीर खाद्य संकट को कम करने के लिए शाकम्भरी मां का अवतार लिया था। इन्हें सब्जियों, फलों और हरी पत्तियों की देवी के रूप में भी जाना जाता है। आइए जानते हैं शाकम्भरी नवरात्रि के आखिरी दिन यानी पौष पूर्णिमा की आरंभ और समापन समय।

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शाकम्भरी पूर्णिमा की तिथि और समय :

तिथि प्रारम्भ – जनवरी 28, बृहस्पतिवार को रात 01 बजकर 17 मिनट से
तिथि समाप्त – जनवरी 29, शुक्रवार को रात 12 बजकर 45 मिनट तक

मां शाकम्भरी की पूजा विधि :

  • माता के श्रद्धालु पौष मास की अष्टमी से पूर्णिमा तक प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर मां शाकम्भरी की विधि-विधान से पूजा करते हैं.
  • पूजा में माता शाकम्भरी की प्रतिमा या तस्वीर पर गंगाजल का छिड़काव कर उनके चारों ओर ताजे फल और मौसमी सब्जियां चढ़ाते हैं.
  • अगर संभव है तो माता शाकम्भरी के मंदिर में जाकर उनकी पूजा-अर्चना कर माता को पवित्र भोजन, जिसे प्रसादम् भी कहा जाता है का भोग लगाना चाहिए.
  • पूजा के आखिर में माता शाकम्भरी की आरती उतारते हैं. इसके पश्चात सभी उपस्थितजनों को पवित्र भोजन वितरित किया जाता है.
  • व्रत रखने वाले व्यक्ति को शाकम्भरी कथा अवश्य पढ़नी चाहिए.
  • व्रत रखने वालों को इस दिन ‘शाकंभरी नीलवर्णानीलोत्पलविलोचना। मुष्टिंशिलीमुखापूर्णकमलंकमलालया।।’  मंत्र का जाप करना चाहिए.
Shakambhari Jayanti Poojan
Shakambhari Jayanti Poojan

क्या है शाकम्भरी कथा :

देवी भागवतम के अनुसार, एक बार दुर्गम नाम का एक दानव, जिसने तमाम कष्ट और तपस्या के बाद भगवान को प्रसन्न कर चारों वेदों का अधिग्रहण कर लिया था. उसे यह भी वरदान प्राप्त था कि देवताओं के लिए की जानेवाली सभी पूजा और प्रार्थनाएं उसके पास पहुंचेगी. इतनी शक्तियां पाने के बाद उसने सभी को परेशान करना शुरू कर दिया.

चारों ओर त्राहिमाम त्राहिमाम मच गया. परिणाम यह हुआ कि लंबे समय तक पृथ्वी पर बारिश नहीं हुई, जिससे गंभीर अकाल की स्थिति पैदा हो गई. सभी तपस्वी, साधु एवं ऋषि-मुनि हिमालय की गुफाओं में चले गए. उन्होनें देवी माँ से सहायता हासिल करने के लिए निरंतर यज्ञ और तप शुरु कर दिया.

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उनके कष्टों को सुनकर, आदि देवी ने मां शाकम्भरी को अनाज, फल, जड़ी-बूटियाँ, दालें, सब्जियाँ, और साग-भाजी आदि वितरित करने का आदेश दिया. इस तरह देवी, शाकम्भरी देवी के नाम से प्रसिद्ध हुई. कहा जाता है कि लोगों की दुर्दशा देखकर माता शाकम्भरी की आंखों से 9 दिनों निरंतर आँसू बहते रहे, जो शीघ्र ही एक नदी में परिवर्तित हो गया. शीघ्र ही अकाल हमेशा के लिए लोप हो गया.

शाकम्भरी पूर्णिमा का महत्व :

शाकंभरी नवरात्रि की पूर्णिमा का बहुत महत्व है. भारत में विभिन्न स्थानों पर, इस दिन को पौष पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है. इस्कॉन के अनुयायी या वैष्णव सम्प्रदाय इस दिन की शुरुआत पुष्य अभिषेक यात्रा से करते हैं, क्योंकि यह पवित्र माघ मास की शुरुआत भी है इस विशेष दिन पर पवित्र नदी अथवा सरोवरों में स्नान करने वालों की जिंदगी खुशियों से भर जाती है, माता लक्ष्मी की उन पर विशेष कृपा बरसती, देह त्यागने के पश्चात जातक को मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

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