कब है ऋषि पंचमी व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा और इस व्रत का महत्व

0
253

हेलो फ्रेंड्स , हिन्दू धर्म में कई त्योहार आते हैं और इन्हीं में से एक प्रमुख त्योहार है ऋषि पंचमी का. ऋषि पंचमी व्रत 23 अगस्त 2020 को है. यह व्रत मासिक धर्म में हुई गलतियों के पापों के प्रायश्चिक के लिए रखा जाता है. ऋषि पंचमी का दिन पूर्ण रूप से ऋषियों को समर्पित होता है. Rishi Panchami 2020

भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के नाम से जानते हैं. व्रत के दृष्टिकोण से यह दिन काफी महत्वपूर्ण माना गया है. कई बार महिलाएं कुछ परेशानियों के कारण व्रत नहीं रख पाती है. ऐसे में आपको यह व्रत उद्यापन करके ही छोड़ना चाहिए, जिससे आप पाप की भागीदार न बन सकें तो चलिए जानते हैं ऋषि पंचमी व्रत की उद्यापन विधि और इस व्रत का महत्व.

यह भी पढ़ें – हरतालिका तीज पर डायबिटीज के मरीज व्रत रखने से पहले ये 7 बातें जान लें

ऋषि पंचमी तिथि और शुभ मुहूर्त :

Rishi Panchami Shubh Muhurat

  • ऋषि पंचमी तिथि प्रारम्भ 22 अगस्त शाम 7 बजकर 57 मिनट पर
  • पूजा मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 6 मिनट से दोपहर 1 बजकर 41 मिनट तक
  • ऋषि पंचमी तिथि का समापन 23 अगस्त शाम 5 बजकर 4 मिनट तक
Rishi Panchami 2020
Rishi Panchami 2020

ऋषि पंचमी व्रत विधि :

Rishi Panchami Vrat Vidhi

  • ऋषि पंचमी व्रत करने वालों को इस दिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करने चाहिए.
  • आप ऋषि पंचमी व्रत की विधि किसी ब्राह्मण से करा सकती हैं या फिर स्वंय भी कर सकती हैं.
  • ऋषि पंचमी के दिन सात पुरोहितों को भोजन के लिए आमंत्रित करें और सप्तऋषि मानकर उनका पूजन करें.
  • पुरोहितों को भोजन कराने से पहले ऋषि पंचमी की पूजा अवश्य करें, इसके लिए पहले पूरे घर को गाय के गोबर से लिपें
  • इसके बाद सप्तऋषि और देवी अरूंधती की प्रतिमा बनाएं और फिर कलश की स्थापना करें.
  • कलश की स्थापना के बाद हल्दी, कुमकुम ,चदंन, पुष्प और अक्षत से पूजा करें.

यह भी पढ़ें – पुत्रदा एकादशी व्रत कथा, पूजा विधि एवं शुभ मुहूर्त, पुत्र प्राप्ति के लिए करें ये व्रत

इस मंत्र का करें जाप :

Rishi Panchami Mantra

कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:।

जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषय: स्मृता:।।

गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।

ऋषि पंचमी व्रत की कथा :

Rishi Panchami Vrat Katha

विदर्भ देश में एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी। उसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण की दो संतान थी: एक पुत्र और एक पुत्री। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया लेकिन दुर्भाग्यवश उसकी पुत्री के पति की अकाल मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसकी विधवा बेटी अपने घर वापस आकर रहने लगी।

एक दिन अचानक से मध्यरात्रि में विधवा के शरीर में कीड़े पड़ने लगे जिसके चलते उसका स्वास्थ्य गिरने लगा। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है?

यह भी पढ़ें : हरतालिका तीज व्रत शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और कथा

पुत्री को ऐसे हाल में देखकर ब्राह्मण उसे एक ऋषि के पास ले गए। ऋषि ने बताया कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसने एक बार रजस्वला होने पर भी घर के बर्तन छू लिए और काम करने लगी। बस इसी पाप की वजह से इसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। चूंकि शास्त्रों में रजस्वला स्त्री का कार्य करना वर्जित होता है लेकिन ब्राह्मण की पुत्री ने इस बात का पालन नहीं किया जिस कारण उसे इस जन्म में दंड भोगना पड़ रहा है।

धर्म-शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य की प्राप्ति होगी।

Rishi Panchami 2020
Rishi Panchami 2020

पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।

ऋषि पंचमी का महत्व :

Rishi Panchami Mahatva

ऋषि पंचमी का पवित्र दिन महान भारतीय सप्तऋषियों की स्मृति में मनाया जाता है। ऋषि पंचमी का त्यौहार मनाने के पीछे कुछ धार्मिक मान्यतायें हैं। पंचमी शब्द पांचवें दिन का प्रतिनिधित्व करती है इसलिए, ऋषि पंचमी का पावन त्योहार भाद्पद माह की पंचमी को श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

यहाँ भी पढ़ें : भाद्रपद की संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत, जानिए कथा और पूजन…

सप्तर्षि से जुड़े हुए सात ऋषियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए स्वयं के जीवन का त्याग किया और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया था।

हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों में भी इसके बारे में बताया गया है ये संत अपने शिष्यों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित करते थे जिससे प्रेरित होकर प्रत्येक मनुष्य दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।

ऋषि पंचमी के दिन व्रत रखना काफी ज्यादा फलदायी होता है। इस दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन के बाद कथा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यह व्रत लोगों के समस्त पापों को समाप्त करता है और शुभ फलदायी होता है।

यह व्रत ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण और सम्मान की भावना को दर्शाता है। पहले यह व्रत सभी वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था लेकिन समय के साथ आए बदलाव के बाद अब यह व्रत अधिकतर महिलाएं ही करती है।

इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी खास महत्व होता है। ऋषि पंचमी की पूजा के लिए सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना कर उन्हें पंचामृत स्नान देना चाहिए इसके बाद उन पर चंदन का लेप लगाते हुए फूलों एवं सुगंधित पदार्थों और दीप-धूप आदि अर्पण करना चाहिए। इसके साथ ही सफेद वस्त्रों, यज्ञोपवीत और नैवेद्य से पूजा और मंत्र का जाप करने से इस दिन विशेष कृपा प्राप्त होती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here