Maa Chandraghanta Vrat Katha
Maa Chandraghanta Vrat Katha
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Maa Chandraghanta Vrat Katha : चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन (navratri poojan third day) मां दुर्गा का स्वरूप देवी चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। मां दुर्गा के इस अवतार की पूजा वैष्णो देवी में की जाती है। मां चंद्रघंटा की आराधना और साधना करने से मन को असीम शांति प्राप्त होती है और इनकी साधना करने से जातक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है। मां चंद्रघंटा (maa chandraghanta) की आराधना करने से भक्तों में वीरता और निर्भयता के साथ-साथ सौम्यता और विनम्रता आती है। मां चंद्रघंटा व्यक्ति के मन पर स्वामित्व रखती हैं और मन में चल रही दुविधा को दूर करती हैं।

माँ चंद्रघंटा की तिथि (Maa Shailputri Tithi)

तारीख4 अप्रैल 2022
दिनसोमवार
देवीमाँ चन्द्रघण्टा
मंत्रॐ चन्द्रघंटायै नमः
फूलपीला गुड़हल का फूल
रंगपीला

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मां चंद्रघंटा का स्वरूप (devi chandraghanta swaroop)

मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है इसी वजह से इन्हें चंद्रघंटा कहा गया है। माता के शरीर का रंग सोने के समान है और इनकी भक्ति से सभी देवगण, संत और भक्त जन के मन को संतोष प्राप्त होता है। मां चंद्रघंटा का प्रिय वाहन सिंह है और ये अपने दस हाथों में खड़क, तलवार, ढाल, गदा, त्रिशूल, चक्र, धनुष, लिए हुए हैं।

मां चंद्रघंटा की कथा (maa chandraghanta katha)

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन समय में देवताओं और असुरों के बीच बहुत लंबे समय तक युद्ध चला। देवताओं के स्वामी भगवान इंद्र थे और असुरों का स्वामी महिषासुर था। जब युद्ध समाप्त हुआ तो महिषासुर ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली और इंद्र का सिंहासन हासिल कर स्वर्ग लोक पर राज करने लगा।

Maa Chandraghanta Vrat Katha
Maa Chandraghanta Vrat Katha

महिषासुर के आतंक के कारण सभी देवता गण परेशान हो गए थे और इस समस्या का हल निकालने के लिए वे देवाधिदेव महादेव, ब्रह्मा, और विष्णु के पास गए। सभी देवताओं ने त्रिदेव को बताया कि राक्षस महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्य सभी देवताओं के अधिकार छीन लिए हैं और इन्हें बंधक बनाकर स्वर्ग लोक में रखा है। महिषासुर के अत्याचार के कारण अन्य सभी देवता पृथ्वी पर विचरण कर रहे हैं और उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया गया है।

यह सुनकर त्रिदेव यानी ब्रह्मा विष्णु और भोलेनाथ को बहुत गुस्सा आया और उनके गुस्से की वजह से तीनों के मुख से उर्जा उत्पन्न हुई। इन तीनों की ऊर्जा के साथ ही अन्य देव गणों की उर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई। उसी ऊर्जा से वहां एक देवी का अवतरण हुआ और उन देवी का नाम चंद्रघंटा पड़ा। भगवान महादेव ने मां चंद्रघंटा को त्रिशूल और भगवान विष्णु ने उन्हें चक्र प्रदान किया। इसी प्रकार सभी देवी देवताओं ने उन्हें अस्त्र-शस्त्र भेंट किए।

भगवान इंद्र ने अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतार कर एक घंटा दिया। सूर्य ने अपना तेज और तलवार मां चंद्रघंटा को दिया और सवारी के लिए एक शेर प्रदान किया। इसी वजह से इस ऊर्जा का नाम देवी चंद्रघंटा पड़ा। देवी चंद्रघंटा ने ही महिषासुर का वध किया था। जब देवी चंद्रघंटा महिषासुर के समक्ष आई तो वह समझ गया था कि अब उसका काल यानी मृत्यु आ गयी है। देवी चंद्रघंटा ने एक ही झटके में महिषासुर और अन्य सभी बड़े दानवों का संहार कर दिया और इस प्रकार देवताओं को असुरों के अत्याचार से मुक्ति दिलवाई।

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देवी चंद्रघंटा की पूजा विधि (maa chandraghanta puja vidhi)

नवरात्रों में सुबह जल्दी नहाकर मां चंद्रघंटा का स्मरण करें और उन्हें प्रणाम करें।
इसके बाद मां को स्नान कराएं। स्नान कराने के लिए कलश में शुद्ध जल भर लें और उसमें थोड़ा सा गंगाजल मिलाएं। साथ ही कलश में चावल, सिक्का, और सुपारी डाल दें। इस जल से माँ को स्नान कराएं।
स्नान कराने के पश्चात मां चंद्रघंटा को पीला फूल चढ़ाएं। मां को पीला रंग अत्यंत पसंद है आप इन्हें पीले वस्त्र ही अर्पण करें।
अब मां को पंचामृत अर्पित करें। पंचामृत बनाने के लिए दूध, दही, शहद, गुड़, और घी का इस्तेमाल करें। मां को गुड़ का भोग अवश्य लगाएं।
इसके बाद मां के समक्ष घी का दीपक जलाएं और कपूर जलाकर उनकी आरती करें। साथ ही दुर्गा सप्तशती और दुर्गा कवच का पाठ करें।
मां चंद्रघंटा की आराधना करने से नौकरी, बिजनेस और कैरियर में आने वाले सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।

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माँ चंद्रघंटा मंत्र (maa chandraghanta mantra)

वन्दे वांछित लाभाय
चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम
कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या
नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि,
रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा
कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां
क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

माँ चंद्रघंटा कवच (devi chandraghanta kavach)

रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि
शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं
सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं
बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति
श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय
निन्दकाय च न दातव्यं
न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

माँ चंद्रघंटा की आरती (Maa Chandraghanta Aarti)

जय माँ चन्द्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे काम॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती।
चन्द्र तेज किरणों में समाती॥
क्रोध को शांत बनाने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली॥
मन की मालक मन भाती हो।
चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥
सुन्दर भाव को लाने वाली।
हर संकट में बचाने वाली॥
हर बुधवार को तुझे ध्याये।
श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥
मूर्ति चन्द्र आकार बनाए।
शीश झुका कहे मन की बाता॥
पूर्ण आस करो जगत दाता।
कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥
कर्नाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटू महारानी॥
भक्त की रक्षा करो भवानी।

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Akanksha
मेरा नाम आकांक्षा है, मुझे नए नए टॉपिक पर आर्टिकल्स लिखने का शौक पहले से ही था इसलिए मैंने आकृति वेबसाइट पर लिखने का फैसला लिया !

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