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हेल्लो दोस्तों हिंदू धर्म में कामदा सप्तमी व्रत हिन्दू धर्म अपना एक अलग महत्व रखता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कामदा सप्तमी का व्रत भक्त मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु करते हैं। हिंदू धर्म में बहुत से फलदायी व्रतों में से एक कामदा सप्तमी व्रत हर महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है और हर चौमासे अर्थात् हर चार माह में इस व्रत का पारण करना चाहिए।

कामदा सप्तमी व्रत पूर्णतयः भगवान सूर्यदेव को समर्पित माना जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा के साथ पूजा और व्रत करता है उसे सभी पापों से मुक्ति मिलने के साथ ही स्वास्थ्य, संतान, धन और मान-सम्मान में वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है. कामदा सप्तमी का व्रत जून माह में 6 जून, सोमवार को रखा जाएगा। इस व्रत को सालभर तक रखा जाता है।

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ज्योतिष शास्त्र में कामदा सप्तमी व्रत का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों में इस व्रत को कामना पूर्ति के लिए खास माना गया है। कामनाओं को पूरा करने वाला यह व्रत पूरे वर्ष भर चलने वाला व्रत होता है। कामदा सप्तमी व्रत की महिमा स्वयं ब्रह्मा जी ने अपने श्रीमुख से भगवान विष्णु को बतायी थी। इस व्रत को करने से संतान सुखी रहती है और धन, संपत्ति में वृद्धि होती है। तो आइए जानते हैं कामदा सप्तमी का शुभ मुहूर्त, पूजन विधि कथा और महत्त्व…

कामदा सप्तमी शुभ मुहूर्त

Kamda Saptami Shubh Muhurt

  • कामदा सप्तमी व्रत तिथि – 06 जुलाई 2022, बुधवार
  • कामदा सप्तमी प्रारंभ – 05 जुलाई 2022, मंगलवार, शाम 7:29 बजे से
  • कामदा सप्तमी समाप्त – 06 जुलाई 2022, बुधवार, शाम 7:49 बजे तक
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Kamda Saptami Vrat

कामदा सप्तमी व्रत विधि

Kamda Saptami Poojan Vidhi

  • इस व्रत को करने वाले जातक को कामदा सप्तमी व्रत के एक दिन पहले षष्टी तिथि को एक समय भोजन करना चाहिए।
  • इसके बाद सप्तमी व्रत के दिन निराहार रहकर भगवान सूर्य की पूजा करें और ‘खरखोल्काय नमः’ और ‘सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करें।
  • कामदा सप्तमी व्रत के अगले दिन अष्टमी तिथि को सुबह जल्दी स्नान आदि से निवृत्त होकर सूर्य नारायण की पूजा और हवन करने का विधान है।
  • शास्त्रों के मुताबिक व्रत वाले दिन सूर्य देव से संबंधित वस्तुओं जैसे घी, गुड़ आदि का दान करना शुभ होता है।
  • इसके बाद अष्टमी तिथि के दिन ब्राह्मणों का पूजन करके उन्हें खीर खिलानी चाहिए।

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सूर्य देव के मंत्र

  • खरखोल्काय नमः
  • सूर्याय नमः
  • ॐ घृ‍णिं सूर्य्य: आदित्य:
  • ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा
  • ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:
  • ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ
  • ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः
  • ॐ सूर्याय नम:
  • ॐ घृणि सूर्याय नम:
  • सूर्य का तंत्रोक्त मंत्र
  • ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम:

सूर्य देव का प्रार्थना मंत्र

ग्रहाणामादिरादित्यो लोक लक्षण कारक:।
विषम स्थान संभूतां पीड़ां दहतु मे रवि।।

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कामदा सप्तमी व्रत कथा

Kamda Saptami Vrat Katha

कहा जाता है कि पुण्डरीक नामक नागों का एक राज्य था। यह राज्य बहुत वैभवशाली और संपन्न था. इस राज्य में अप्सराएं, गन्धर्व और किन्नर रहा करते थे। वहां ललिता नाम की एक अतिसुन्दर अप्सरा भी रहती थी, उसका पति ललित भी वहीं रहता था। ललित नाग दरबार में गाना गाता था और अपना नृत्य दिखाकर सबका मनोरंजन करता था। इनका आपस में बहुत प्रेम था साथ ही दोनों एक दूसरे की नज़रों में बने रहना चाहते थे.

एक बार राजा पुण्डरीक ने ललित को गाना गाने और नृत्य करने का आदेश दिया। ललित नृत्य करते हुए और गाना गाते हुए अपनी अप्सरा पत्नी ललिता को याद करने लगा, जिससे उसके नृत्य और गाने में भूल हो गई। सभा में एक कर्कोटक नाम के नाग देवता उपस्थित थे, जिन्होंने पुण्डरीक नामक नाग राजा को ललित की गलती के बारे में बता दिया था। इस बात से राजा पुण्डरीक ने नाराज होकर ललित को राक्षस बन जाने का श्राप दे दिया।

इसके बाद ललित एक अयंत बुरा दिखने वाला राक्षस बन गया। जिसे देख उसकी अप्सरा पत्नी ललिता बहुत दुखी हुई। ललिता अपने पति की मुक्ति के लिए उपाय ढूंढने लगी। तब एक मुनि ने ललिता को कामदा एकादशी व्रत रखने की सलाह दी। ललिता ने मुनि के आश्रम में एकादशी व्रत का पालन किया और इस व्रत का पूण्य लाभ अपने पति को दे दिया। व्रत की शक्ति से ललित को अपने राक्षस रूप से मुक्ति मिल गई और वह फिर से एक सुंदर गायक गन्धर्व बन गया।

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कामदा सप्तमी का महत्व

Kamda Saptami Mahatva

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जिन जातकों की कुण्डली में सूर्य नीच का होता है या सूर्य के अच्छे फल प्राप्त नहीं हो रहे, उनके जीवन में काफी परेशानियां आती हैं। उनके लिए यह व्रत आरम्भ करना अत्यंत लाभकारी होता है और सूर्य से मिलने वाले सभी फल सकारात्मक रूप से प्राप्त होते हैं। इस व्रत के प्रभाव से सभी परेशानियों से निजात मिलती है। ऐसे जातकों का सूर्य बलवान हो जाता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है।

सूर्य देव को कुंडली में मान सम्मान, स्वास्थ्य, तेज, आत्मविश्वास और सत्ता-सुख का कारक माना गया है। ऐसे में यह व्रत खासतौर पर उन जातकों के लिए बहुत फलदायी माना जाता है जिनकी कुंडली में सूर्य ग्रह की स्थिति कमजोर है और किसी काम में सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही है। इस व्रत को करने से धन, सेहत संबंधी समस्याएं दूर होने के साथ ही जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता मिलने की मान्यता है।

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