हेल्लो दोस्तों हिंदू धर्म में सुहागन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना से साल भर में कई व्रत करती हैं, जिनमें से एक है जया पार्वती व्रत (Jaya Parvati Vrat)। हिंदू पंचांग के अनुसार, जया पार्वती व्रत हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। इसे विजया-पार्वती व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत मां पार्वती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इस साल जया पार्वती व्रत 22 जुलाई से शुरु हो रहा है और 26 जुलाई को इसका समापन होगा।

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जया पार्वती व्रत एक बहुत ही शुभ उपवास है जो कि लगातार पांच दिनों तक चलता है। इस व्रत को करने से स्त्रियों को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मिलता है। यह व्रत मालवा क्षेत्र का लोकप्रिय पर्व है लेकिन भारत के पश्चिमी भाग विशेष रूप से गुजरात में महिलाएं इस व्रत को बड़ी संयम और भक्ति के साथ रखती हैं। जया पार्वती व्रत भी गणगौर, हरतालिका, मंगला गौरी और सौभाग्य सुंदरी व्रत की तरह ही होता है। पुराणों के अनुसार इस व्रत का रहस्य भगवान विष्णु ने केवल माँ लक्ष्मी को बताया था।

इस व्रत को कठिन माना जाता है, इसलिए इसके नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। कहा जाता है कि एक बार इस व्रत को शुरु करने के बाद कम से कम 5, 7, 9, 11 या 20 साल तक करना चाहिए। इस व्रत को पूरी श्रद्धा और निष्ठा से करने पर भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। चलिए जानते हैं जया पार्वती व्रत शुभ मुहूर्त, नियम, पूजा विधि और इसका महत्व।

Jaya Parvati Vrat
Jaya Parvati Vrat

शुभ मुहूर्त :

अभिजीत मुहूर्त – 22 जुलाई 2021 को सुबह 11:57 से दोपहर 12:52 बजे तक.
विजय मुहूर्त – 22 जुलाई 2021 को दोपहर 02:43 से दोपहर 03:38 बजे तक.
गोधुली मुहूर्त – 22 जुलाई 2021 को शाम 07:05 से शाम 07:29 बजे तक.

व्रत से जुड़े नियम :

  • जया पार्वती व्रत में गेहूं के बीजों को मिट्टी के बर्तन में लगाया जाता है और पांच दिनों तक उस बर्तन की पूजा की जाती है।
  • व्रत के दौरान 5 दिनों तक गेहूं से बनी किसी भी चीज का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • पांच दिनों तक नमक और खट्टी चीजों के सेवन से भी परहेज करना चाहिए।
  • व्रत के दौरान 5 दिनों तक फलाहार का सेवन करना चाहिए।
  • छठे दिन यानी समापन के दिन गेहूं से भरा पात्र किसी नदी या तालाब में प्रवाहित करना चाहिए।

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व्रत पूजन विधि :

  • आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लें।
  • इसके बाद पूजा स्थल पर सोने, चांदी या फिर मिट्टी के बैल पर बैठे हुए शिव पार्वती की मूर्ति को स्थापित करें।
  • स्थापना किसी ब्राह्मण के घर पर वेद मंत्रों से कराएं। इसके बाद पूजा प्रारंभ करें।
  • पूजा में कुमकुम. कस्तूरी, अष्टगंध, फल और फूल अवश्य शामिल करें।
  • इसके बाद नारियल, दाख, अनार और अन्य ऋतु फल चढ़ाएं और विधि पूर्वक पूजा करें।
  • इसके बाद मां पार्वती का स्मरण करें और उनकी पूजा करें। मान्यता है कि शिव और पार्वती की पूजा गोधुली मुहूर्त में करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
  • अंत में कथा करें। कथा सुनने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उसके बाद खुद बिना नमक का भोजन ग्रहण करें।
  • शाम को पूजा के बाद पति के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए. इसी तरह से 5 दिनों तक नियमपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

जया-पार्वती व्रत (Jaya Parvati Vrat) कथा :

पौराणिक कथा के अनुसार किसी समय कौडिन्य नगर में वामन नाम का एक योग्य ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सत्या था। उनके घर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान नहीं होने से वे बहुत दुखी रहते थे। एक दिन नारद जी उनके घर आए, उन्होंने नारद की खूब सेवा की और अपनी समस्या का समाधान पूछा। तब नारद ने उन्हें बताया कि तुम्हारे नगर के बाहर जो वन है, उसके दक्षिणी भाग में बिल्व वृक्ष के नीचे भगवान शिव माता पार्वती के साथ लिंगरूप में विराजित हैं। उनकी पूजा करने से तुम्हारी मनोकामना अवश्य ही पूरी होगी। ब्राह्मण दंपत्ति ने उस शिवलिंग को ढूंढ़कर उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इस प्रकार पूजा करने का क्रम चलता रहा और पांच वर्ष बीत गए।

Jaya Parvati Vrat
Jaya Parvati Vrat

एक दिन जब वह ब्राह्मण पूजन के लिए फूल तोड़ रहा था तभी उसे सांप ने काट लिया और वह वहीं जंगल में ही गिर गया। ब्राह्मण जब काफी देर तक घर नहीं लौटा तो उसकी पत्नी उसे ढूंढने आई। पति को इस हालत में देख वह रोने लगी और वन देवता व माता पार्वती को स्मरण किया।

माँ पार्वती ने दिखाई राह –

ब्राह्मणी की पुकार सुनकर वन देवता और मां पार्वती चली आईं और ब्राह्मण के मुख में अमृत डाल दिया, जिससे ब्राह्मण उठ बैठा। ब्राह्मण दंपत्ति ने माता पार्वती का पूजन किया। माता पार्वती ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें वर मांगने के लिए कहा। तब दोनों ने संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। माता पार्वती ने उन्हें विजया पार्वती व्रत करने की बात कही।

आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन उस ब्राह्मण दंपत्ति ने विधिपूर्वक माता पार्वती का यह व्रत किया, जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। इस दिन व्रत करने वालों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है तथा उनका अखंड सौभाग्य भी बना रहता है।

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जया पार्वती व्रत का महत्व :

मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से सुहागन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और खुशहाल जीवन का वरदान मिलता है, जबकि कुंवारी कन्याओं को व्रत के प्रभाव से अच्छा जीवनसाथी मिलता है। इस व्रत को करने से महिलाओं को जन्म-जन्म तक उनके पति का साथ मिलता है, इसलिए जया पार्वती व्रत को अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला और सुख-समृद्धि देने वाला माना गया है।

जो कोई भी इस व्रत को निष्ठा पूर्वक पूरे नियम के साथ करता है उन्हें भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और घर में हमेशा सुख समृद्धि बनी रहती है। इस व्रत में पूजा के लिए बालू रेत से हाथी बनाया जाता है तथा उन पर 5 प्रकार के फल, फूल और प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। व्रत के आखरी दिन विवाहित महिलाएं रात को जागरण करती हैं। इस रात के जागरण को अगले दिन तक आगे बढ़ाया जाता है जिसे गौरी तृतीया के रूप में मनाया जाता है। इस जागरण को जया पार्वती जागरण कहा जाता है।

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