Angarki Sankashti Chaturthi
Angarki Sankashti Chaturthi

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हेल्लो दोस्तों हिन्दू मान्यता के अनुसार कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह तिथि भगवान लंबोदर यानी गणेश जी को समर्पित की जाती है। मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी ‘अंगारकी संकष्टी चतुर्थी’ के नाम से भी जानी जाती है।

आम तौर पर यह उपवास हिंदू कैलेंडर में प्रत्येक पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की ‘चतुर्थी‘ पर किया जाता है। हर शुभकार्यों के प्रारम्भ में श्री गणेश की पूजा-अर्चना सर्वप्रथम करने का विधान है। यह व्रत महिला एवं पुरुष के लिए समान रूप से फलदायी है। अंगारकी चतुर्थी व्रत छः माह में एक बार आता है और पूरे साल सौभाग्य लाता है। इस बार कृष्ण पक्ष की अंगारकी संकष्टी चतुर्थी मंगलवार, 19 अप्रैल को पड़ रही है। अगली अंगारकी संकष्टी चतुर्थी आश्विन कृष्ण पक्ष, 13 सितम्बर 2022 को पड़ेगी।

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अंगारकी संकष्टी चतुर्थी मुहूर्त (Angarki Sankashti Chaturthi Muhurt)

अंगारकी संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत वैशाख कृष्ण पक्ष की चौथ के दिन मनाया जाता है, इस साल यह व्रत 19 अप्रैल 2022 के दिन शुरू है. इस व्रत का खास महत्व रहता है।

  • तिथि – कृष्ण पक्ष संकष्टी चतुर्थी, मंगलवार, 19 अप्रैल 2022
  • अंगारकी चतुर्थी तिथि प्रारंभ – 19 अप्रैल शाम 4:39 बजे से
  • अंगारकी चतुर्थी तिथि समाप्त – 20 अप्रैल दोपहर 1:53 बजे तक

क्यों मनाई जाती है अंगारकी चतुर्थी (Angarki Sankashti Kyu Manate Hain)

‘अंगारकी’ संस्कृत मूल का एक शब्द है जिसका अर्थ है ‘लाल जैसा जलता हुआ कोयला’। हिंदू भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने और व्रत रखने से उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस प्रकार अंगारकी चतुर्थी मुक्ति का दिन है। भगवान गणेश ने इस दिन भगवान मंगल को आशीर्वाद दिया था। इसलिए इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को भगवान गणेश और भगवान मंगल दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

अंगारक (मंगल देव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने वरदान दिया और कहा कि यदि चतुर्थी की तिथि मंगलवार को होगी तो इसे अंगारकी चतुर्थी के नाम से मनाया जाना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी कार्य बिना किसी रुकावट के पूरे हो जाते हैं। भगवान गणेश की कृपा से भक्तों को सभी सुख मिलते हैं।

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अंगारकी संकष्टी चतुर्थी की पूजा-विधि (Angarki Sankashti Poojan Vidhi)

  • इस दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व स्नान-ध्यान एवं नित्य क्रिया से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • यदि संभव हो तो लाल रंग के वस्त्र धारण करें, ऐसा करना शुभ माना जाता है।
  • अब मंदिर के सामने उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह करके साफ आसन पर बैठें।
  • सर्वप्रथम भगवान गणपति को दूर्वा अर्पित करें और उनके सामने धूप-दीप प्रज्जलित करें।
  • अब लाल पुष्प, रोली, अक्षत, चंदन, इत्र एवं सुहाग की चीजें चढ़ाते हुए ‘ॐ श्री गणेशाय नमः’ अथवा ‘ॐ गं गणपते नमः’ मंत्र का जाप करें।
  • भगवान गणेश जी का पूजन करते हुए इस मंत्र का जाप करें –
    मंत्र – गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणं।
    उमासुतं शोक विनाशकारकम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।
  • शाम के समय श्रीगणेशजी की व्रत कथा पढ़ें और आरती उतारें।
  • चंद्रोदय के पश्चात चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें और ग़रीबों को दान दें।
  • इस दिन भगवान गणेश की स्तुति में भजन और धार्मिक भजन भी गाए जाते हैं।
  • गणेश पूजन के दौरान भूलकर भी तुलसी के पत्तों का प्रयोग ना करें। शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि गणेश जी को तुलसी के पत्ते चढ़ाना वर्जित माना जाता है।
Angarki Sankashti Chaturthi
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अंगारकी चतुर्थी व्रत कथा (Angarki Sankashti Chaturthi Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि भारद्वाज और देवी पृथ्वी के पुत्र का नाम मंगल था. मंगल ने अपने पिता की आज्ञा से मात्र सात वर्ष की आयु से भगवान गणेश की कठोर तपस्या आरम्भ कर दी थी। उस बालक ने भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक कठोर ताप किया, निराहार रहा। उसकी इस श्रद्धा और भक्ति को देखकर भगवान गणेश प्रसन्न हो गए और उन्होंने मंगल को कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन दर्शन दिए।

भगवान गणेश ने पृथ्वी पुत्र को दर्शन देकर वरदान मांगने के लिए कहा। धरती पुत्र ने भगवान गणेश से सदैव उनकी शरण में रहने के साथ स्वर्ग में देवताओं के समकक्ष पद पाने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान गणेश ने उनकी मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया और कहा तुम्हे स्वर्ग में देवताओं के समान सम्मान प्राप्त होगा। तुम मंगल और अंगारक नाम से प्रसिद्ध होंगे। मंगलवार के दिन आने वाली संकष्टी चतुर्थी को तुम्हारे नाम अर्थात अंगारकी चतुर्थी के नाम से जाना जाएगा और इसका व्रत एवं पूजन करने से साधक को वर्ष की सभी संकष्टी चतुर्थी के व्रत का पुण्य लाभ होगा। ऐसा कहकर भगवान गणेश अंतर्ध्यान हो गए।

संकष्टी चतुर्थी का यह व्रत बहुत ही दुर्लभ है और इसकी महिमा अपरम्पार है। इसका व्रत करने से जातक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान गणेश जी की कृपा से उसे सुख-शांति और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

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अन्य प्रचलित कथाएं

कहा जाता है कि एक बार जब माता पार्वती भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। इसके बावजूद भी शिवजी प्रसन्न नहीं हो रहे थे, तब माता पार्वती ने संकष्टी चतुर्थी व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से भगवान शिव प्रसन्न हुई और तब शिवजी के साथ उनका विवाह सम्पन्न हो सका।

पुराणों में यह भी बताते हैं कि हनुमान जी ने भी सीता जी की खोज में जाने से पूर्व भगवान गणेश का संकष्टी चतुर्थी व्रत किया था। इसके अलावा जब राजा बलि ने रावण को कैद कर लिया था, तब उससे मुक्ति पाने के लिए स्वयं रावण ने भी इस व्रत को किया था, और गणेश जी के आशीर्वाद से राजा बलि की कैद से आजाद हुए थे।

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अंगारकी संकष्टी का महत्त्व (Angarki Sankashti Chaturthi Mahatva)

मंगलवार के दिन अंगारकी चतुर्थी होने से इस व्रत का महत्त्व बढ़ जाता है, क्योंकि इस दिन श्रीगणेश जी के साथ हनुमान जी की भी पूजा अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि जिनकी कुंडली में मंगल दोष होता है, उन्हें इस दिन गणपति बप्पा की पूजा के साथ-साथ हनुमान जी की भी पूजा करनी चाहिए, इससे कुंडली का मंगल दोष दूर हो जाता है। पूजन के समय भगवान श्रीगणेश जी को दूर्वा एवं मोदक अर्पित करें, इसके बाद हनुमान जी को पीला सिंदूर एवं लड्डू चढ़ाएं।

ऐसी धार्मिक व पौराणिक मान्यता है कि श्रीगणेश अथर्वशीर्ष का प्रात:काल पाठ करने से रात्रि के समस्त पापों का नाश होता है। संध्या समय पाठ करने पर दिन के सभी पापों का शमन होता है। यदि विधि-विधानपूर्वक एक हजार पाठ किए जाएं तो मनोरथ की पूर्ति के साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है। यह भी माना जाता है कि जो व्यक्ति अंगारकी चतुर्थी पर पवित्र व्रत रखता है, उसे वही लाभ मिलता है, जो पूरे वर्ष संकष्टी गणेश चतुर्थी रखने से प्राप्त होता है।

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