9 महीने से पहले पैदा हुए शिशुओं में होता है बिमारियों का खतरा

गर्भाधान के बाद अगर कोई बच्चा 37 हफ्तों में या उस से थोड़ा पहले जन्म लेता है तो उसे प्रीमैच्योर बेबी यानी समय से पहले जन्मा बच्चा कहा जाता है. आमतौर पर बच्चा 40 सप्ताह तक गर्भ में रहता है. उस का समय पूर्व जन्म होने से उस को गर्भ में विकसित होने के लिए कम समय मिल पाता है. इसलिए उस को अकसर जटिल चिकित्सकीय समस्याएं होती हैं. Premature Babies Disease

समय से पहले जन्मे शिशुओं में आगे चलकर गुर्दे की बीमारी क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) विकसित होने का जोखिम बना रहता है, यह बात एक शोध में सामने आई है. बीएमजे में प्रकाशित स्टडी की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रीटर्म बर्थ यानी 37 सप्ताह की गर्भावस्था से पहले ही शिशु का जन्म होने पर गुर्दे के विकास और परिपक्वता में बाधा उत्पन्न होती है. इस कारण कम नेफ्रॉन बन पाते हैं. नेफ्रॉन वे फिल्टर हैं, जो शरीर से बेकार और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालते हैं.

भारत में अंतिम चरण के गुर्दे की विफलता विकसित करने वाले सभी रोगियों में से केवल 10 से 15 प्रतिशत को ही उचित उपचार मिलता है. लगभग 6,000 किडनी प्रत्यारोपण, 60,000 हेमोडायलिसिस से गुजरते हैं और अन्य 6,000 एक वर्ष में पेरिटोनियल डायलिसिस लेते हैं. गुर्दे की रिप्लेसमेंट थेरेपी की चाह में लगभग छह लाख लोग मर जाते हैं.

Premature Babies Disease

अंतिम चरण की किडनी की बीमारी विकसित करने वाले सभी रोगियों में से 90 प्रतिशत से अधिक को गुर्दे की रिप्लेसमेंट थेरेपी की जरूरत होती है, क्योंकि देखभाल का खर्च वहन करने में असमर्थता के चलते और 60 प्रतिशत वे लोग भी जो वित्तीय कारणों से उपचार को बीच में ही छोड़ देते हैं. मई, 2017 तक डायलिसिस पर निर्भर रोगियों की संख्या 1,30,000 से अधिक थी. यह संख्या लगभग 232 प्रति 10 लाख जनसंख्या के हिसाब से बढ़ रही है.

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हार्टकेयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के.के. अग्रवाल ने बताया कि सीकेडी का अर्थ है समय के साथ गुर्दे की कार्यक्षमता में कमी होते जाना और अंत में गुर्दे का विफल हो जाना. इससे मरीजों को डायलिसिस या गुर्दा प्रत्यारोपण से गुजरना पड़ता है. बीमारी के संकेत और लक्षण तब तक ध्यान देने योग्य नहीं होते, जब तक कि रोग काफी अच्छी तरह से बढ़ नहीं जाता और स्थिति गंभीर न हो गई हो.

उन्होंने कहा- “सीकेडी के एक उन्नत चरण में शरीर में तरल पदार्थ, इलेक्ट्रोलाइट्स और कचरे के खतरनाक स्तर का निर्माण हो सकता है. मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, किडनी की असामान्य संरचना और बीमारी के पारिवारिक इतिहास जैसी अंतर्निहित स्थितियों के साथ वे अधिक जोखिम में हैं. इसके अलावा, जो लोग धूम्रपान करते हैं और मोटापे का शिकार होते हैं, वे भी लंबी अवधि में सीकेडी का शिकार हो सकते हैं.”

इस स्थिति के कुछ लक्षणों में मतली, उल्टी, भूख में कमी, थकान और कमजोरी, नींद की समस्या, मानसिक सक्रियता में कमी, मांसपेशियों में मरोड़ व ऐंठन, लगातार खुजली, सीने में दर्द, सांस की तकलीफ और उच्च रक्तचाप शामिल हैं.

Premature Babies Disease

डॉ. अग्रवाल ने आगे कहा, “गुर्दे की बीमारियों को दूर रखने के लिए कुछ प्रमुख उपाय क्रमश: परिस्थितियों और मोटापे और डिसिप्लिडिमिया जैसी बीमारियों की निगरानी और उपचार करना है. यदि रक्तचाप और रक्त शर्करा को नियंत्रण में रखा जाए, तो 50 प्रतिशत से अधिक सीकेडी मामलों को रोका जा सकता है.”

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बच्चे के समय पूर्व जन्म लेने का कारण स्पष्ट नहीं हो पाता, लेकिन कारण कई हैं.

  • यदि महिला को पहले भी समय से पहले प्रसव हो चुका हो.
  • 2 या 2 से अधिक बच्चे गर्भ में होना.
  • 2 गर्भाधानों के बीच कम का वक्त होना.
  • इनविंट्रो फर्टिलाइजेशन द्वारा गर्भाधान.
  • गर्भाशय, गर्भग्रीवा या प्लेसैंटा के साथ समस्या और गर्भाशय का आकार असामान्य होना.
  • सिगरेट, शराब का सेवन या नशीली दवाएं लेना.
  • मां को पर्याप्त पोषण न मिलना.
  • स्वाभाविक रूप से अपरिपक्व प्रसव पीड़ा उठना और वक्त से पहले ही मैंबे्रन (तरल पदार्थ का थैला) का टूटना.
  • कोई संक्रमण होना, विशेष कर ऐमनियौटिक फ्लूड और प्रजनन अंग के निचले हिस्से में कोई क्रौनिक स्थिति, जैसे उच्च रक्तचाप और डायबिटीज.
  • गर्भधारण से पहले वजन कम या अधिक होना.
  • जीवन में तनाव की घटनाएं होना, जैसे घरेलू हिंसा.
  • एक से ज्यादा बार मिसकैरेज या गर्भपात होना.
  • शारीरिक चोट या ट्रौमा.

प्रीमैच्योर बच्चे को हो सकती हैं ये जटिलताएं :

सेरेब्रल पाल्सी :

सेरेब्रल पाल्सी हिलनेडुलने, मांसपेशियों या मुद्रा का विकार है, जो प्रीमैच्योर बच्चे के विकासशील मस्तिष्क में चोट लगने (गर्भावस्था में या जन्म के बाद) से उत्पन्न होता है. रक्तप्रवाह की खराबी, अपर्याप्त औक्सीजन आपूर्ति, पोषण की कमी या संक्रमण के चलते मस्तिष्क में पहुंची चोट से सेरेब्रल पाल्सी या अन्य न्यूरोलौजिकल समस्याएं हो सकती हैं.

खराब संज्ञानात्मक कौशल :

प्रीमैच्योर बच्चा विकास के विभिन्न पैमानों पर अपने हमउम्र बच्चों से पिछड़ जाता है. जो बच्चा वक्त से पहले पैदा हो गया हो उसे स्कूल जाने की उम्र में सीखने के मामले में दिक्कतें हो सकती हैं.

दृष्टि दोष :

प्रीमैच्योर बच्चे में रेटिनोपैथी औफ प्रिमैच्योरिटी (आरओपी) पनप सकती है. यह बीमारी तब होती है जब रक्त धमनियां सूज जाती हैं और रेटिना (आंख का पिछला हिस्सा) की प्रकाश के प्रति संवेदनशील तंत्रिकाओं की परत ज्यादा बढ़ जाती है. कुछ मामलों में रेटिना की असामान्य धमनियां रेटिना पर जख्म पैदा कर देती हैं, उसे उस की जगह से बाहर खींच लेती है. और यदि इस समस्या का पता न लगाया गया तो नजर कमजोर हो जाती है और अंधापन तक आ सकता है.

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सुनने में दिक्कत :

प्रीमैच्योर बच्चे में बहरेपन का जोखिम ज्यादा होता है. इस का पता तब चलता है जब बच्चे के घर लौटने से पहले उस की श्रवण क्षमता की जांच की जाती है.

दंत समस्या :

जो प्रीमैच्योर बच्चा गंभीर रूप से बीमार होता है. उस में दंत समस्याएं विकसित होने का जोखिम ज्यादा रहता है. जैसे दांत देर से निकलना, दांतों का मलिन होना और दांतों की पंक्ति गड़बड़ होना.

मनोवैज्ञानिक समस्याएं :

जो बच्चे अपना गर्भकाल पूरा कर के जन्मे हैं उन के मुकाबले वक्त से पहले पैदा हुए बच्चे में व्यवहार संबंधी और मनोवैज्ञानिक समस्याएं हो सकती हैं. जैसे अटैंशन डेफिसिट हाइपरऐक्टिविटी डिसऔर्डर, अवसाद या सामान्य व्यग्रता तथा अपनी उम्र के बच्चों से घुलनेमिलने में कठिनाई.

Premature Babies Disease

क्रौनिक स्वास्थ्य समस्याएं :

प्रीमैच्योर बच्चे में क्रौनिक स्वास्थ्य समस्याएं होने की ज्यादा संभावना रहती है. जैसे संक्रमण, दमा और फीडिंग की समस्या.

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कुल मिला कर वक्त से पहले पैदा हुए बच्चे में चिकित्सकीय जटिलताओं तथा भावी विकास की अक्षमताओं का ज्यादा जोखिम होता है. हालांकि मैडिकल साइंस में प्रगति होने से समय से बहुत जल्दी पैदा होने वाले बच्चों के जीवित बचने की संभावनाओं में सुधार हुआ है. फिर भी विकास के मामले में ऐसे बच्चों के पिछड़ने का जोखिम ज्यादा रहता है.

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